आजाद को लेकर दिए बयान पर ममता अडिग
कोलकाता में अपने आवास पर संवाददाताओं से बातचीत में बुधवार को ममता ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के आह्वान पर नक्सलियों के जवाब पर खुशी जताते हुए कहा कि समस्या का हल शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से होना चाहिए।
इससे पहले सोमवार को नक्सलियों के शीर्ष नेता किशनजी ने राष्ट्रपति की ओर से बातचीत के आह्वान पर तीन महीने के संघर्ष विराम और प्रस्तावित बातचीत के लिए एक मध्यस्थ का प्रस्ताव रखा था। किशनजी ने मध्यस्थ के रूप में ममता का नाम भी सुझाया था।
मध्यस्थ के रूप में ममता ने अपना नाम सुझाए जाने पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। परंतु उन्होंने कहा, "अगर कोई इस मामले पर मेरे साथ चर्चा करना चाहता है तो मैं अपनी राय देने को तैयार हूं।"
उन्होंने कहा, "मैंने मीडिया में खबरें देखी हैं। परंतु बीते 10 दिनों में मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई है। इस बारें में सरकार को फैसला करना है। मैंने इस संबंध में सरकार से भी कोई बातचीत नहीं की है।"
बीते नौ अगस्त को लालगढ़ में एक सभा के दौरान दिए बयान के बारे में ममता ने कहा, "मैंने जो कुछ भी लालगढ़ में कहा था, वह तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष होने की हैसियत से कहा था। मैं उस पर कायम हूं।"
ममता ने उस जनसभा में कहा था, "मेरा मानना है कि आजाद को मारना सही नहीं था। आजाद ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास जताया था।"
इस बारे में ममता ने कहा, "लोकतंत्र में मैं अपनी राय किसी पर थोप नहीं सकती। इसी तरह कोई और भी अपनी राय मेरे पर नहीं थोप सकता। यह मेरा विचार है। यह मेरी अभिव्यक्ति की आजादी है। कोई भी मेरी आलोचना कर सकता है। अगर यह सकारात्मक रही तो मैं इसका स्वागत करूंगी। परंतु मुझे अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।"
लालगढ़ में सभा के बारे में उन्होंने कहा, "लालगढ़ क्या है? मैं वहां फिर जाऊंगी। मैं शांति चाहती हूं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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