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उत्तराखण्ड में एक और आंदोलन की सुगबुगाहट

आंदोलन की पृष्ठभूमि दीक्षित कमीशन द्वारा गैरसेण को राज्य की राजधानी बनाने के लिए उपयुक्त ना माने जाने के बाद उपजे असंतोष से तैयार हुई है।

आंदोलन का तानाबाना बुन रहे देवभूमि संस्कृति रक्षा मंच के कार्यवाहक अध्यक्ष प्रकाश हरबोला ने बताया कि उत्तराखंड वासी अलग राज्य पाकर भी ठगा महसूस कर रहे है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में होनी चाहिए।

दीक्षित कमीशन के सुझावों के खिलाफ रोश प्रकट करते हुए हरबोला ने कहा कि राज्य की राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में बने, इसके लिए नवरात्र के प्रथम दिन से राज्यव्यापी आंदोलन की शुरुआत होगी। उन्होंने बताया कि आंदोलन की रूपरेखा बननी शुरू हो गई है। आंदोलन को एक तीसरा गैर राजनीतिक मोर्चा बनाकर चलाया जाएगा।

हरबोला ने बताया कि इस कार्य में उन्हें जनता सहित भाजपा, कांग्रेस और यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) के नेताओं का भी भारी समर्थन मिल रहा है।

पर्वतीय क्षेत्र में राजधानी के लिए दलील पेश करते हुए हरबोला ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में विकास का प्रवाह बहना चाहिए। यदि वास्तव में विकास पर्वतीय क्षेत्र का करना है तो उस दिशा में ही सरकार को आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि अलग राज्य बनने के बावजूद भी पर्वतीय क्षेत्र में विकास की कमी होने के कारण लोगों का पलायन मैदानी इलाकों में हो रहा है। राज्य की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

जाने माने लोक गायक एन. एस. नेगी भी दीक्षित कमीशन के सुझावों से आहत हैं। उन्होंने हाल ही में दीक्षित कमीशन के सुझावों के खिलाफ एक गाना भी तैयार किया है। नेगी ने बताया कि वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्य नहीं करते, बल्कि जनता की वास्तविकता को अपने शब्दों में बयां करते हैं।

गौरतलब है कि नेगी उत्तराखण्ड के जानेमाने लोकगायक हैं। वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार के खिलाफ सूबे की जनता में माहौल बनाने में इनके गाए गीतों का भारी योगदान रहा। नारायण दत्त तिवारी के क्रियाकलापों के खिलाफ गढ़वाली बोली में इनके गीत 'नौछमी नारायण' ने उन दिनों राज्य में धूम मचाई थी। राजनीतिक दलों ने तो उनके गीतों की सीडी तैयार कर जनता में मुफ्त में बंटवाई थी।

उत्तराखंड युवा क्रांति दल के अध्यक्ष एवं विधायक पुष्पेश त्रिपाठी का कहना है कि पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की राजधानी गैरसेण में होनी चाहिए। राज्य की जनता का भी यही मत है।

उन्होंने कहा कि स्वयं दीक्षित आयोग ने माना है कि राजधानी के लिए जनभावना गैरसेण के पक्ष में हैं, लेकिन स्थाई राजधानी के लिए जनभावना के खिलाफ जाते हुए उसने भौगोलिक परिस्थितियों को आधार बनाते हुए देहरादून और हरिद्वार के बीच स्थित हर्रावाला को राजधानी बनाने की सिफारिश की है।

त्रिपाठी ने गैरसेण को राजधानी बनाने के लिए हो रहे विलम्ब में भाजपा-कांग्रेस दोनों दलों को जिम्मेदार ठहराया है। साथ ही उन्होंने मांग की है कि दोनों ही दल राज्य की स्थाई राजधानी के बारे में अपनी राय स्पष्ट करें। गैरसेण के लिए चलने वाले आंदोलन के सवाल पर उन्होंने कहा कि आंदोलन से विकास पर असर पड़ता है, लेकिन अवसर आएगा तो वह आंदोलन से नहीं चूकेंगे।

गौरतलब हो कि नौ नवम्बर, 2000 को प्रभाव में आए उत्तराखंड राज्य में शुरू से ही यह मांग जोरशोर से उठती रही है कि राज्य की राजधानी किसी पर्वतीय क्षेत्र में बनें। किन्तु तत्कालीन सुविधाओं के लिहाज से देहरादून को अस्थाई राजधानी चुना गया। नई राजधानी के चयन हेतु सेवा निवृत न्यायाधीश विरेन्द्र दीक्षित के नेतृत्व में एक आयोग का गठन 11 जनवरी 2001 को किया गया था।

आयोग ने अपने दस सेवा विस्तार के बाद सात वर्षो में अपनी रिपोर्ट तैयार की। हाल ही में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत किया था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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