संक्रमित रक्त चढ़ाने से 8 बच्चे एचआईवी की चपेट में

उमेद मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. आर.के. आसेरी का कहना है कि अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त की जांच पूरी तरह से नाको की गाइड लाइन के अनुसार की गई है। इस बाबत जांच कर रही कालेज के चिकित्सकों की तीन सदस्यीय समिति के अलावा पूर्व में केंद्र सरकार की कमेटी भी अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि कर चुकी है।

इस बीच एचआईवी की चपेट में आए थैलीसीमिया पीड़ित आठ बच्चों का जोधपुर मेडिकल कालेज के एड्स वार्ड में उपचार किया जा रहा है, लेकिन हैपेटाइटिस पीड़ित 46 बच्चों को इलाज में सरकार की ओर से किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिल रही है।

डा. आसोरी के अनुसार विशेषज्ञों की रिपोर्ट सोमवार को कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को भेज दी गई है। उन्होंने बताया कि इस बीच थैलीसीमिया पीड़ित जिन तीन बच्चों में एचआईवी के लक्षण मिले हैं, उनकी जांच के लिए डाक्टरों की एक और कमेटी गठित की गई है।

मारवाड़ थैलीसीमिया सोसायटी के सचिव डा. विपिन गुप्ता ने बताया कि ब्लैड बैंक में एचआईवी और एचसीवी से संक्रमित रक्त होने की जानकारी सबसे पहले इस साल जनवरी में तब मिली जब थैलीसीमिया पीड़ित पांच बच्चों की जांच में उनमें एचआईवी के लक्षण पाए गए।

गुप्ता के अनुसार अब तक जोधपुर संभाग में थैलीसीमिया पीड़ित आठ बच्चों को एचआईवी और 46 बच्चों को हैपेटाइटिस होने की शिकायत मिल चुकी है। इन बच्चों की उम्र तीन से 18 साल तक की है। जोधपुर संभाग में थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या 130 है।

कालेज के प्राचार्य डा. आसेरी का कहना है कि जनवरी में सामने आए मामलों की जांच पूरी हो गई है। इस बाबत गठित कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्लड बैंक में खून की जांच पूरी तरह नियमानुसाार की जा रही है और पूर्व में भी की जाती रही है।

डा. आसोरी मानते हैं कि संभवत: जिन बच्चों में एचआईवी के लक्षण पाए गए हैं, उन्हें विंडो पीरियड के दौरान आया रक्त चढ़ाया गया होगा।

डा. विपिन गुप्ता का कहना है कि जोधपुर सहित राजस्थान के किसी भी सरकारी अस्पताल में विंडो पीरियड रक्त की जांच करने के लिए एलएसटी मशीन की सुविधा नहीं है। इसलिए आशंका है कि उमेद अस्पताल के ब्लड बैंक में इसी कारण संक्रमित रक्त जमा हुआ होगा।

जानकार सूत्रों के अनुसार अस्पताल के ब्लड बैंक में पिछले दो साल के दौरान विभिन्न माध्यमों से आए 19 हजार से अधिक यूनिट खून में से साढ़े पांच सौ से अधिक यूनिट खून में संक्रमण के लक्षण पाए गए थे।

मारवाड़ थैलीसीमिया सोसायटी के सचिव डा. गुप्ता चाहते हैं कि जिन बच्चों में एचआईवी और हैपेटाइटिस के लक्षण पाए गए हैं, राज्य सरकार उनका उपचार अपने खर्च पर कराए। क्योंकि हैपेटाइटिस जैसे रोग का ठीक से उपचार कराने के लिए कम से कम तीन लाख रुपये की जरूरत होती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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