'पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के दिन लदने के आसार' (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 3 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में रविवार को हुए शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों में मिली भारी हार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 1977 से राज्य की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा अगले बरस सत्ता से बाहर हो जाएगा।

वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों के संभावित परिणामों के बारे में यह बेबाक राय मार्क्‍सवादी कम्युनस्टि पार्टी (माकपा)के एक नेता ने गुरुवार को व्यक्त की।

राज्य में वाम मोर्चा सरकार की अगुवाई करने वाली माकपा के इस वरिष्ठ नेता ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि "माकपा विरोधी लहर इस हद तक बढ़ चुकी है" कि साल भर में उसका रुख पलटना संभव नहीं है।

नाम गुप्त रखने की शर्त पर उक्त नेता ने कहा, "पार्टी के मझोले स्तर के नेताओं का 'दंभपूर्ण रवैया' और भ्रष्टाचार ऐसे दो महत्वपूर्ण कारण हैं जिनकी वजह से माकपा का जनाधार तेजी से कम हुआ।"

उन्होंने बताया, "नगर निकायों के नतीजे दरअसल उसी रुझान का अगला चरण थे जो पंचायत चुनावों और पिछले साल के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला था। "

उन्होंने कहा, "जनता तय कर चुकी है कि उसे परिवर्तन की जरूरत है। मतदाता जान चुके हैं कि उसका एक ही तरीका है... कि तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया जाए, चाहे किसी को उसकी नेता(ममता बनर्जी) को लेकर चाहे कितने ही ऐतराज क्यों न हों। कल के नतीजों से यह संदेश साफ मिल रहा है।"

पश्चिम बंगाल में बुधवार को घोषित स्थानीय निकायों के चुनावों के परिणामों के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे से प्रतिष्ठित कोलकाता नगर निकाय में सत्ता छीन ली और अन्य कई निकायों में भी उसे करारी शिकस्त दी।

तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों का गढ़ समझे जाने वाले कस्बाई और औद्योगिक क्षेत्रों में भी सेंध लगाई है।

इन परिणामों से वाम मोर्चे को आघात पहुंचा है जिसे उम्मीद थी कि उसके संगठन और तृणमूल तथा कांग्रेस के बीच वाम-विरोधी मतों के विभाजन से उसे फायदा पहुंचेगा।

इस मार्क्‍सवादी नेता ने माकपा के कुछ नेताओं की इन टिप्पणियों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि स्थानीय निकायों के चुनावों के ज्यादा अर्थ निकालने की जरूरत नहीं है क्योंकि शहरी निकायों के मतदाता राज्य की कुल मतदाता संख्या का केवल 17 प्रतिशत हैं।

माकपा नेता ने कहा, "यह(तर्क) बचकाना और हास्यास्पद है।" उन्होंने कहा कि शहरी मतदाता देश में सबसे ज्यादा मुखर है और उनके मतदान के रुझान का व्यापक असर समाज पर पड़ना अनिवार्य है।

उन्होंने कहा कि 30 साल के निर्बाध शासन की वजह से मार्क्‍सवादी नेताओं को यह दंभ हो गया था कि पार्टी हमेशा सही थी और उसे पश्चिम बंगाल में जीवन के सभी पहलुओं पर नियंत्रण करना चाहिए।

माकपा के इस नेता ने कहा, "इस रुख की वजह से उनमें, खासतौर पर मझौले स्तर पर भ्रष्टचार घर करने लगा।"

क्या माकपा विधानसभा चुनावों से पहले वाम विरोधी इस रुझान को बदल सकती है? यह पूछने पर उक्त नेता का कहना था कि जब तक कोई चमत्कार न हो जाए या ममता बनर्जी कोई राजनीतिक भूल न कर बैठें, यह लगभग असंभव है।

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि माकपा के मित्र उसे खतरे से आगाह नहीं कर रहे थे, पर दुर्भाग्यवश पार्टी ने इन चेतावनियों को नजरंदाज किया। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि पार्टी में बदलाव होंगे।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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