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ऐसी है काबुल में ज़िंदगी

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    ऐसी है काबुल में ज़िंदगी

    बीबीसी के साउथ एशिया एडिटर नाज़ेश अफ़रोज़ ने कई बार अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की है, ख़ास तौर पर 2002 से 2004 के बीच. पाँच साल के अंतराल के बाद वे एक बार फिर काबुल पहुँचे जहाँ उन्होंने जीवन को काफ़ी बदला हुआ पाया. काबुल में आए बदलाव पर यह विशेष आलेख.

    जब मेरा विमान उतरने वाला था तो मेरी नज़रें खिड़की से बाहर बमबारी में तबाह हुए हवाई जहाज़ों के मलबे को ढूँढ रही थीं, वर्ष 2002 से लेकर 2004 की गर्मियों तक जब भी मैं काबुल गया तो मुझे यही नज़ारा दिखाई देता था.

    हवाई पट्टी के चारों तरफ़ बिखरे जले हुए विमानों के ढाँचे की तस्वीर मेरे दिमाग़ में बैठ-सी गई है लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था, हवाई पट्टी बिल्कुल साफ़ सुथरी थी.

    2004 तक हवाई अड्डे पर एक अकेला थका-हारा इमिग्रेशन अधिकारी बैठा होता था जिसका काम पूरे विमान के लोगों के वीज़ा पासपोर्ट की जाँच करना होता था. अगर आप भागकर क़तार में आगे जाकर न खड़े हों तो इस पूरी प्रक्रिया में घंटों लग जाते थे.

    सामान के लिए कोई बेल्ट नहीं था, कुछ मज़दूर थे जो दीवार में बने एक छेद से सामान अंदर फेंकते थे, कोई ट्रॉली भी नहीं होती थी ऐसे में हमें रेडियो प्रसारण के भारी उपकरणों से भरे बैग को बड़ी मुश्किल से घसीटना पड़ता था.

    अब एयरपोर्ट पर वीज़ा पासपोर्ट चेक करने के लिए व्यवस्थित काउंटर बने हैं, अच्छा बैगेज कलेक्शन एरिया है, सामान के लिए बेल्ट भी है और ट्रॉलियाँ भी.

    शहर की हालत

    सरकारी इमारतों, होटलों, गेस्टाउसों और शॉपिंग सेंटरों को निशाना बनाकर तालेबान बड़े छोटे हमले करता रहता है, कार बम धमाके और आत्मघाती धमाके पिछले एक साल से अक्सर होते रहते हैं.

    यही वजह है कि मेरे दिमाग़ में ऐसी छवि थी कि काबुल ऐसा शहर होगा जहाँ लोग डर और तनाव में जी रहे होंगे, चारों तरफ़ कड़ी सुरक्षा होगी. लेकिन काबुल मुझे तीसरी दुनिया के किसी आम शहर जैसा ही दिखाई दिया जिससे मुझे सुखद आश्चर्य हुआ.

    मैंने जैसा पाँच साल पहले देखा था उसके मुक़ाबले काबुल मुझे जीवन से भरपूर दिखाई दिया. बाज़ारों में काफ़ी भीड़ भाड़ थी, सड़कों पर कारों की कतारें थीं जिनकी वजह से ट्रैफ़िक जाम लगा हुआ था. मगर इससे लोगों को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा था, रेंगती हुई गाड़ियों में बैठे ड्राइवर कुछ भुनभुनाते थे, सड़क पर खड़ा कोई आदमी ट्रैफ़िक को व्यवस्थित करने के लिए आगे आ जाता था.

    शहर की सड़कें अब भी उतनी ही पतली हैं जितनी पाँच साल पहले थीं, अलबत्ता वे अब अधिक टूटी-फूटी हैं. यहाँ तक कि सिटी सेंटर में भी कई जगहों पर पक्की सड़कें नहीं हैं, शहर धूल से भरा हुआ है लेकिन आधुनिक इमारतों ने शहर का हुलिया बिल्कुल बदल दिया है, काँच की चमकदार ऊँची इमारतें नज़र आने लगी हैं.

    शहर के कई हिस्से जो गृह युद्ध के दौर में ध्वस्त हो गए थे उन्होंने दोबारा बना दिया गया है, पूरे शहर में इमारतें बनाने का काम चल रहा है. मैं 2002 से 2004 के बीच जब भी काबुल गया तो मुझे सड़कों पर सैकड़ों विदेशी सैनिक दिखाई देते थे--अमरीकी, जर्मन और तुर्क. बड़ी बख़्तरबंद गाड़ियों की ऊपरी हिस्से पर मशीनगन से लैस सैनिक.

    काबुल की सड़कों पर इस बार एक भी विदेशी सैनिक दिखाई नहीं दिया. सड़कों और सरकारी इमारतों पर सुरक्षा की ड्यूटी पर अफ़ग़ान हथियारबंद पुलिस तैनात है, मगर सड़कों पर बने नाकों की संख्या 2004 के मुक़ाबले बढ़ गई है.

    इतनी बड़ी संख्या में तैनात हथियारबंद पुलिसवाले और जगह-जगह लगाए गए नाकों की वजह से विदेशी लोग बहुत घबराए-से रहते हैं, ज्यादातर विदेशी लोग या तो किसी ग़ैर सरकारी संगठन से जुड़े हैं या फिर कूटनयिक हैं. मैंने जब-जब उनसे बात की तो उन्होंने अपने नर्वस होने का ज़िक्र किया.

    सड़कों पर यह घबराहट नहीं दिखती, हम देर रात तक शहर की सड़कों पर गाड़ियों में घूमते रहे, सड़कों पर औरतें, पुरुष और बच्चे किसी आम शहर की ही तरह घूम रहे थे. 2004 में ऐसा नहीं था, शाम के बाद सड़कों पर सन्नाटा होता था.

    नया शहर

    जब मैंने अपने परिवार के लोगों और दोस्तों को बताया कि मैं काबुल जा रहा हूँ तो वे बहुत चिंतित थे. उन्हें मुझे बहुत सतर्क रहने को कहा, उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि तालिबान शहर के हर कोने में मौजूद हैं और किसी भी विदेशी को देखते ही उस पर हमला कर देते हैं.

    कई लोगों से बात करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि उनकी इस चिंता की वजह मीडिया में अफ़ग़ानिस्तान की सिर्फ़ हिंसा की रिपोर्टिंग है. किसी पश्चिमी देश की राजधानी में बैठकर काबुल की ऐसी तस्वीर उभरती है मानो वहाँ युद्ध चल रहा हो.

    इस बात की बहुत कम रिपोर्टिंग होती है कि शहर में जीवन किस तरह चल रहा है, और कई मामलों में तो फलफूल रहा है.

    मैंने अपने कुछ सहकर्मियों के साथ काबुल के शहर-ए-नौ में शाम को और दिन में भी चहलकदमी की. वहाँ चलना बहुत मुश्किल था सिर्फ़ इसलिए नहीं कि सड़कें टूटी फूटी थीं बल्कि इसलिए कि वहाँ भीड़ बहुत ज्यादा थी. लोगों की इस भीड़ में आगे बढ़ने के लिए रास्ता निकालना कोई आसान काम नहीं है.

    सड़क के किनारे बनी बेकरियों से ताज़ा कबाब और नान की खूशबू हवा में तैरती रहती है, काँच की ऊँची इमारतों के बाहर ऑफिस के लिए जगह ख़ाली होने का इश्तहार लगा है, दुकानों में सूखे मेवे से लेकर गिटार तक और विलायती शादी के जोड़े से लेकर कसरत करने की मशीनें सब दिखाई देते हैं.

    ये सब मिलकर जो तस्वीर बनाते हैं वह एक ऐसे शहर की है जो तमाम मुश्किलों और चिंताओं के बीच एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहा है.

    मैंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कई साथियों से बात की जिनके परिवार 2002 में पाकिस्तान या ईरान चले गए थे. 2005-2006 तक ये परिवार बड़े असमंजस में थे कि वापस अफ़ग़ानिस्तान जाएँ या नहीं. लेकिन अब उनका कहना है कि उन्होंने अपना मन बना लिया है, वे काबुल में ही रहना चाहते हैं.

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