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ठंडे बस्‍ते में न चला जाए महिला आरक्षण बिल

By डा. अतुल कुमार
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Parliament Of India
राजनैतिक प्रतिनिधित्व में महिला वर्ग की संख्या बल को सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। राज्यसभा में पास होने के बाद भी यह बिल ठण्डे में जाता दिख रख रहा है। सच तो यही है कि भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे नेताओं के खोखले वादे, हवाई घोषणाएं व तुगलगी निर्णयों के कारण पहले से ही त्रस्त जनता को बरगलाने के लिए आरक्षण बड़ा ही कारगार झुनझुना है।

आरक्षण की नैया ने कई चुनावी दरिया पार करवा दिये और फिर राजनेताओं की मौज ही मौज। पक्ष और विपक्ष दोनों ही के नेता 'महिला" के लिए नहीं मगर 50 प्रतिशत वोट पर अपनी राजनैतिक पकड़ और विरोधी को धराशायी करने की सोच लिए इस विषय पर बहस का नाटक कर रहे हैं। जनता मान चुकी है शहीदों के त्याग और बलिदान से मिली आजादी का लड्डू सेवादार का नकाब ओढ़ कर संसद में खाने कमाने लूटने को आ गये।

गोरों की लूट के बाद नेहरू और जिन्ना देश बांटकर खा गये और जनता रोटी पानी को तरसती रोड-नाली की चाह में साठ सालों से धिसट कर अब जिन्दगी को रो रही है। महिला आरक्षण पर विचार रखने वाले दो मूल शब्द है पहला महिला और दूसरा आरक्षण। आखिर महिला कौन? आरक्षण किसका? इसे भी परिभाषित कर विचार करने की जरूरत है। हिन्दुस्तानी औरत की क्या पहचान है? नारी सुलभ गुण क्या है? भारतीय नारी का क्या परिचय है?

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बुद्धिजीवी वर्ग जरा भारतीय महिला की पहचान, हिन्दुस्तानी नारी की परिभाषा तो बताएं। यदि सबला बनने के लिए अबला का आँचल क्षीर और नयन नीर रिक्त हो जाए तो वहाँ स्त्रीत्व ही कहाँ बचा? जबरन बराबरी के नाम पर नारी को पुरूषों के दुर्गणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना कितना सही है? साथ ही चौखट के बाहर असुरक्षित जमाने में क्यों भटकने के लिऐ मजबूर किया जा रहा है? औरत पर थोपा जा रहा है कुछ ले कर आने के लिऐ।

गहराई से सोचा जाए तो लम्बे मानव जाति के इतिहास ने महिला को परिस्थिति प्रकृति और परिवेश के मध्य स्वाभाविक रूप से माँ, बहन, पत्नी, बेटी के चरित्र में पुरूषों की छाया में स्वयं को ज्यादा सुरक्षित पाया। यह और बात है कि आज का पुरूष वर्ग पौरूष रहित होकर पशु स्तर पर गिर गया है। जरूरत है आदमी को मर्द बने रहने की। नारी को सुरक्षा और स्नेह देना पौरूष धर्म है। परन्तु बाप में बेटी से आमद की उम्मीदें जग चुकी है। मियां की चाहत कमाऊँ बीबी है। आज जबकि चौखट के भीतर होते अत्याचार मूक सह परेशान अबला को चौखट के बाहर जाते ही भूखे भेड़ियों का भी अत्याचार खूब सहती है।

कौन नहीं जानता जरा ऊँची आवाज में कहे कि दैहिक शोषण नहीं हो रहा। गोद में बैठे बगैर प्रोड्यूसर से हिरोइन का रोल नहीं, ट्रेनर से टीम में नाम नहीं, पायलट के विदेश दौरे में एयर होस्टेज का नाम नहीं, एडीटर से रिर्पाेटर का जाब नहीं। दोपायों में वहशी दरिंदों को मिटाये बगैर किसी तरह का आरक्षण हिन्दुस्तानी महिला के भले के लिए नहीं है। आरक्षण क्यों और आरक्षण किस के साथ? यदि महिला की परिभाषा हो और भारतीय महिला की भी परिभाषा हो तो कुछ समझ में आ जाएगो।

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आरक्षण से पूर्व आवश्यक था शिक्षा और रोजगार में बढ़ोतरी जिसे सीटें बढ़ाकर पूरा किया जाना था। उसकी जगह उपलब्ध को एक से छीनकर दूसरे को देने वाला बंदरबाट निर्णय को आरक्षण कहा जा रहा है। महिला को आरक्षण या आरक्षित करने की मानसिकता के बीच जो राजनीति राजनीतिज्ञ कर रहें हैं उसने यहां तो आर-क्षण अर्थात हर पल का डंक बना दिया। जिस अबला के नाम पर यह बिल पेश कर रहे हैं उसका बिलबिलाना उन्हें कभी दिखा ही नहीं। सच तो यही होना है अंततः उसका कुछ भी नहीं होगा। सोलह-अठारह साल की उम्र से पैंतीस-चालीस साल की उम्र तक चार-छः और दस तक बच्चे पैदा करने वाली मशीन को प्रसव गृह से फुर्सत हो तो तब वह संसंद में पहुँचेगी।

चौखट के भीतर होते अपनों के अत्याचार को दिल में दबाये जब बाहर पांव रखती है तो परायों के दुराचार से दो चार होना यह सहना उसकी नियति है। मेट्रो व बसों की आरक्षित सीटें हिन्दुस्तानी नारी के लिए खाली नहीं होती तो संसंद की क्या होगी? हाँ! जिस तरह इन वाहनों में पटाका मार्का के लिए आखिर तक का बंदा अपनी सीट त्यागने को तैयार रहता है ठीक उसी तरह दो पुरूष सांसदों के मध्य एक परकटी जरूर जगह बना जाएगी। हो गया तैंतीस का कोटा पूरा।

आखिरकार आरक्षण के पन्नों में ही उसे अक्स दिखा कर यह बिल औरत को शोषण सहने का अब एक और आलम्ब बन कर रह जाएगा, जैसे अदालत और पुलिस केवल कागजों में ही उसके लिऐ है। जैसे तैसे पेट काट कर अपने लिए जोड़ी एक चेन उडा दिये जाने पर नीचु से ऊपर कोई सुनवाई नहीं पर वीआईपी का तोता जरूर महकमे ने ढूंढ़ देना है।

महिला आयोग और कानून के पत्नी अधिकार उसे जुल्म को शब्द के रूप में याद कर सहने को है, पर असल में अधिकार कहाँ - यह नहीं पता? किरण बेदी जैसी मजबूत महिला का क्या हश्र हुआ और तब संसंद ने क्या किया। वैसे ही तैंतीस पर स्त्री का नाम होगा पर हां सौ की सौ को कष्ट देने का लाइसेंस जरूर हासिल कर लेगें। बीपीएल कार्ड गरीबों के अलावा सब को दिया जाता है। लाडली का भी यही हाल है। मन मोहन की मेहरबानी हर किस न पब्लिक स्कूलों में हर लड़कियों की यहाँ तक अनुसूचित जाति की भी से फीस ली जाती है और नाटक के लिए घोषणाएं ढेरों हैं। गरीब ने एससी या एसटी लिख दिया तो एडमीशन तक नहीं।

एक और सच के आकंड़े जाने- 1971 में मुकाबले बलात्कार और अत्याचार 2010 में एक हजार गुना ज्यादा है। क्या महिला सशक्तिकरण पर ऊपर से शर्मनाक बात है कि अपराधी पकड़ने में प्रशासन दो हजार गुना पीछे हैं। महिला का दोयम दर्जे का स्वरूप कवियत्री सम्मेलन सही कह कर चित्रित करता है- वह अपने और पराये इन दो-दो यम भी फांस लिए तिलतल को हर पल मरती है। कई राजा राम मोहन राय को जन्म लेने होगें तब कहीं महिला को ताड़न के अधिकार से ऊपर माना जाऐगा। यह हालात हर कहीं हैं।

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बीस बरस शादी के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिह अपनी अय्याशी में रूकावट पाते ही पत्नी मनोरंजना को तलाक देता है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का खास नौकर यूनुस सलीम अपनी बीवी अंजुम सलीम को सौंवें अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर इसलिए तलाक देता है क्योंकि बीबी

ने अरीना सलीम, ईलाना सलीम और ईरीम सलीम तीन लड़कियों को जन्म देती लेकिन एक भी लड़का नहीं जन्मा। क्या नाटक है? दूसरी शादी के लिए तलाक, तलाक, तलाक, कह पल्ला झाड़ देना काफी है। सचिव फंर्नाडीस महोदय इसकी शिकायत पर न तो ध्यान देते हैं और न ही महिला आयोग, न आरक्षण के पैरोकार। यदि सचमुच में महिला के साथ न्याय करना चाहे तो पुरूषों की लिखी पुराण कुरान जला देना होगा।

तलाक का अधिकार पति को तो होना ही नहीं चाहिऐ। विवाह एक समाजिक बंधन के नाते और पति पत्नी के निजी सबंध ठोस परिभाषित होने चाहिऐ। कौन सी सरकार महिला सशक्तिकरण की बात करती है। कौन सा प्रशासन महिला समर्थन का दावा करते है। घर या बाहर बलात्कार समाज का एक दैनिक कार्य हो गया। कहीं जीजा देवर है कहीं पड़ोसी टीचर - कहीं सिक्योरिटी लिफ्ट मैन और कहीं बाॅस सहयोगी। सामुहिक बलात्कार रोज होते हैं पर किसी के रक्त को उबाल नहीं देता। तंदूर कांड का दोषी आज भी तिहाड़ में ऐश कर रहा है। हर गली में कुचली जाती है कोमल कली खिलने से पहले। नाबलिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर जिस्मफरोसी के धंधे में धकेल देना सबकी आंखों के सामने चल रहा है।

कैसा महिला शक्तिकरण और कैसा महिला आरक्षण? सच कहूँ तो यह दिखती है देश राक्षस और बर्बर शेर वाला एक जंगल है। कोई शक्तिशाली भीम नहीं जो उस राक्षस से गांव वालों को बचाएं जिसे नियमित खुराक के रूप में हर घर से एक सदस्य और खाना पीना चाहिए था। वैसा ही जंगल के खूंखार शेर की तरह शहर में अपराधी के आगे नियम से रोज एक घर की लड़की को काम पिपासा शांत करने के लिए भेज रखा है ताकि बाकी बची रहे, मगर कोई चतुर खरगोश नहीं है जो शेर के जैसे वहशी दरिंदों को किसी कुएं में गिरा नारी को नर्क और इस नर्क की सी जिन्दगी से निजाद दिलाए।

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