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फिर लौटा पाकिस्तानी तालिबान

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    फिर लौटा पाकिस्तानी तालिबान

    अहमद रशीद

    स्तंभकार

    पाकिस्तानी सेना ने जिन कबायली इलाकों और स्वात घाटी से चरमपंथियों के सफ़ाए का दावा किया था वहां स्थानीय तालिबान फिर लौट आए हैं.

    कुछ इलाकों में वो लोग जो लड़ाई के दौरान भाग गए थे वो भी लौट रहे हैं.

    इस क्षेत्र की स्थिति पर एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय नज़र है ख़ासकर न्यूयॉर्क में हुए असफल बम हमले के बाद से.

    न्यूय़ॉर्क के कथित हमलावर फ़ैसल शहज़ाद के बारे में कहा जा रहा है कि उसने वज़ीरिस्तान इलाक़े में तालिबान से प्रशिक्षण लिया.

    एक बार फिर से पाकिस्तानी तालिबान ने स्थानीय नेताओं की हत्या शुरू कर दी है, आम लोगों को धमका रहे हैं, सुरक्षा बलों के लिए ख़तरा बन रहे हैं और विकास कार्यक्रमों को रोक रहे हैं.

    एक आत्मघाती हमलावर ने 1 मई को स्वात घाटी में पांच लोगों को मार दिया वहीं अप्रैल में मिंगोरा में कम से कम छह जानेमाने कबायली नेताओं की उनके घर के बाहर हत्या कर दी गई.

    भारी हथियारों से लैस चरमपंथी मोटरसाइकिलों पर गांवों से गुज़रते हैं और आम जनता में दहशत पैदा कर रहे हैं.

    लड़कियों के स्कूलों को जलाया जा रहा है और पुलिस की आंखों के सामने उन सब लोगों को धमकाया जा रहा है जो सेना के साथ सहयोग करते हैं.

    ये सारी बातें स्पष्ट संकेत देती हैं कि तालिबान पूरे ज़ोरशोर से स्वात में लौटने की तैयारी कर रहा है.

    पाकिस्तानी तालिबान के नेता मौलाना फ़ज़लूल्लाह अभी भी ज़िंदा हैं और कभी भी सामने आ सकते हैं.

    पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफ़ाक कियानी स्थिति का जायज़ा लेने के लिए कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं.

    पाकिस्तानी सेना ने 50,000 सैनिक तैनात कर स्वात और उसके आसपास की घाटियों को चरमपंथियों से मुक्त करवा लेने का दावा किया था.

    और अब चरमपंथी फ़ौज से भी बदला लेना चाहते हैं.

    पश्चिमी और पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार फ़ौज ने 2500 संदिग्ध चरमपंथियों को अनिश्चितकालीन क़ैद में रखा हुआ है क्योंकि आम न्यायिक प्रणाली है वो इन मामलों से नहीं निपट सकती है.

    वहीं उत्तरी वज़ीरिस्तान में हज़ारों लड़ाके और कमांडर फिर से एकजुट हो गए हैं क्योंकि सेना ने उन इलाकों को खुला छो़ड़ रखा है.

    उत्तरी वज़ीरिस्तान अफ़गान तालिबान नेता जलालुद्दीन हक्कानी और पाकिस्तानी तालिबान नेता गुल बहादुर के नियंत्रण में है.

    अमरीका और नैटो दोनों ही ने पाकिस्तानी सेना से उत्तरी वज़ीरिस्तान में अभियान चलाने का आग्रह किया है लेकिन फ़िलहाल सेना ने ये कहकर उसे टाल दिया है कि वो पहले से ही काफ़ी दबाव में हैं.

    पिछले कुछ महीनों से उत्तरी वज़ीरिस्तान में मौजूद चरमपंथी दूसरे कबायली इलाकों में भी प्रवेश कर रहे हैं और सेना के काफ़िले और चौकियों पर हमला कर रहे हैं.

    उत्तरी वज़ीरिस्तान कई चरमपंथी गुटों के लिए पनाहगाह भी बन गया है जिनमें मध्य एशियाई, चेचेन, अरब, कश्मीरी और दक्षिणी पाकिस्तान के पंजाबी गुट भी हैं.

    पूरे क्षेत्र में एक अराजकता का माहौल है क्योंकि अलग अलग गुट ह्क्कानी के नेतृत्व को नज़रअंदाज़ करके काम कर रहे हैं ख़ासकर निर्मम पंजाबी गुटों की अगर बात की जाए.

    सच्चाई ये है कि अभी तक पाकिस्तानी सेना और सरकार ने मिलकर कोई साझा आतंकविरोधी नीति नहीं बनाई है.

    अफ़गानिस्तान में अमरीका और नैटो एक ऐसी नीति के तहत काम कर रहे हैं जिसमें चरमपंथियों को भगाकर, सेना का नियंत्रण कायम करके वहां विकास प्रक्रिया को शुरू करके स्थानीय प्रशासन को सौंपने पर ज़ोर है.

    पाकिस्तान में चरमपंथियों को भगाकर इलाके पर सेना के नियंत्रण का काम हुआ है. सेना वहां विकास प्रक्रिया को भी शुरू करती है लेकिन स्थानीय प्रशासन को कभी ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी जाती.

    इससे आम जनता की स्थिति अजीब हो जाती है—वो सेना की मौजूदगी को नापसंद करती है लेकिन स्थानीय प्रशासन का अस्तित्व नहीं होने के कारण उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता.

    पाकिस्तानी सेना और नागरिक प्रशासन को मिलजुलकर एक रणनीति बनानी होगी जिससे विकास आम जनता तक पहुंचे और चरमपंथी अगलथलग पड़ जाएं.

    ऐसी रणनीति के अभाव में सुरक्षा व्यवस्था दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही है.

    ( अहमद रशीद तालिबान पर किताब लिख चुके हैं और हाल ही में उन्होंने डिसेंट इंटू केओस नामकी किताब भी लिखी है. )

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