दीर्घायु बनाने वाले नए प्रोटीन की पहचान

एरीस्टिन नाम के इस प्रोटीन की मौजूदगी वाले कृमियों का जीवन सामान्य कृमियों की एक अपेक्षा एक-तिहाई अधिक होता है जबकि इस प्रोटीन की तिगुनी मात्रा वाले कृमियों का जीवन एक-तिहाई कम होता है।

शोध में यह भी बताया गया है कि एरीस्टिन आयु को नियंत्रित करने के लिए कई अन्य प्रोटीनों के साथ काम करता है। मनुष्यों में इसी तरह का प्रोटीन पीटीईएन होता है, जो कि ट्यूमर बनने से रोकने वाले प्रोटीन के रूप में जाना जाता है।

थॉमस जैफरसन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता जेफरी एल. बिनोविक कहते हैं कृमि में मौजूद ज्यादातर प्रोटीन मानव प्रोटीनों जैसे ही होते हैं। इससे मानव जीव विज्ञान और कैंसर की उत्पत्ति को समझने में मदद मिलेगी।

बिनोविक कहते हैं, "हमें कृमियों में अध्ययन की जो कड़ियां मिली हैं वे बताती हैं कि स्तनधारियों में भी ऐसा ही होता है यद्यपि मानव विज्ञान अधिक जटिल होता है।"

गोलकृमि की साधारण रचना के चलते इसे शोध में एक मॉडल के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा इसके जीन और प्रोटीनों की कार्य प्रणाली मानव जीवविज्ञान से मिलती-जुलती है।

कृमि में केवल एक एरीस्टिन प्रोटीन होता है जबकि मानव में ऐसे चार प्रोटीन होते हैं। कृमियों में केवल 302 न्यूरॉन्स होते हैं जबकि मानव मस्तिष्क में करीब 100 अरब न्यूरॉन्स होते हैं।

इसके अतिरिक्त कृमियों का जीवन केवल दो से तीन सप्ताह का ही होता है इसलिए उनकी दीर्घायु के अध्ययन के लिए समयबद्ध निरीक्षण की आवश्यकता होती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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