टैगोर की कहानी बयां करता 'जोड़ासान्को ठाकुरबाड़ी'

कोलकाता, 8 मई (आईएएनएस)। उत्तरी कोलकाता का 6, द्वारकानाथ टैगोर लेन, यहीं पर स्थित है आलीशान 'जोड़ासान्को ठाकुरबाड़ी'। यह गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर का पुश्तैनी मकान है। इस आलीशान मकान का हर एक कोना गुरुदेव और उनके परिवार की कहानी बयां करता है।

देवेन्द्र नाथ टैगोर और शारदा देवी के धर 'जोड़ासान्को ठाकुरबाड़ी' में वर्ष 1861 में गुरुदेव का जन्म हुआ और इसी परिसर में वर्ष 1941 में उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

'जोड़ासान्को ठाकुरबाड़ी' को रवींद्र भारती संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। यह अब रवींद्र भारती विश्वविद्यालय का हिस्सा है।

ठाकुरबाड़ी की निरीक्षक इंद्राणी घोष ने आईएएनएस से कहा, "संग्रहालय में लगभग 750 पेंटिंग्स और 700 से अधिक फोटोग्राफ हैं। इसके अलावा गुरुदेव की कई तस्वीरें भी हैं।"

रवींद्रनाथ शायद एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्रीयगान 'आमार सोनार बांग्ला' गुरुदेव की ही रचना है।

ठाकुरबाड़ी परिसर नौ मई से रवींद्र संगीत की धुन में रमा रहेगा। टैगोर के जन्मदिवस से आरंभ होने वाला कार्यक्रम साल भर चलेगा।

ठाकुरबाड़ी की इस ऐतिहासिक इमारत के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के कई विभागों और कक्षाओं को अन्य जगहों पर स्थानांतरित कर दिया गया है।

विश्वविद्यालय की कला संकाय की अध्यक्ष अमिता दत्ता ने आईएएनएस से कहा, "ठाकुरबाड़ी में अब केवल टैगोर अध्ययन केंद्र हैं। यहां सालभर गुरुदेव के साहित्य पर सेमिनार आयोजित किए जात हैं।"

ठाकुरबाड़ी में रवींद्र भारती संग्रहालयका उद्घाटन आठ मई, 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने किया था। इस संग्रहालय को देखने के लिए हर रोज बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।

संग्रहालय तो तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहला हिस्सा 'विचित्र भवन' कहलाता है, जबकि दूसरे व तीसरे का नाम 'महर्षि भवन' और 'राम भवन' है।

'विचित्र भवन' में एक बड़ा हॉल है, जिसमें गुरुदेव के कई दुलर्भ तस्वीरें है। हॉल के बगल में ही एक शयन कक्ष है, जिसमें गुरुदेव की पत्नी मृणालनी देवी रहती थीं। इस कक्ष में अभी भी एक नीली साड़ी, जापानी हाथ पंखा और सजावटी सामान हैं।

'महर्षि भवन' में एक अलमारी है, जिसमें गुरुदेव के कपड़े रखे हैं। इसी घर में उन्होंने अंतिम सांस ली थी। जिस घर में गुरुदेव के पिता देवेंद्रनाथ पूजा किया करते थे, उसे भी आम लोगों के लिए खोला गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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