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तूफान के डर से 'बिल' में घुसे आदिवासी

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    इर्शादुल हक़, अररिया बिहार से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

    बिहार के अररिया ज़िले के एक गाँव के आदिवासी पिछले 13 अप्रैल को आए तूफ़ान के बाद कब्रनुमा घरों में जिंदगी गुज़ार रहे हैं. ये आदिवासी तूफ़ान से इतने डरे हुए हैं कि वे अपनी ध्वस्त झोंपड़ियों के बाहर छह फुट लंबे और चार फुट चौड़े व चार फुट गहरे कब्रनुमा घरों को सुरक्षित मान रहे हैं. कुसियार ग्राम पंचायत के संथाली टोला के संथाल जनजातियों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ इन कब्रनुमा घरों का आविष्कार किया है. स्थानीय लोग इन घरों को 'बिल' कहते हैं.

    तूफ़ान का डर

    'बिल' में तमाम कठिनाइयों के बाद भी उन्हें इस बात का विश्वास है कि अगर फिर तूफ़ान आया तो उन्हें अपने परिवार के सदस्यों की जान नहीं गंवानी पड़ेगी. तूफ़ान में कुसियार गाँव प्रखंड में 10-12 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि अररिया समेत पूर्णिया, सुपौल, किशनगंज, कटिहार आदि ज़िलों में मरने वालों की संख्या इससे कहीं बहुत अधिक थी.

    संथाली टोला के बैजनाथ मुर्मु और हप्पनमये किस्कू बताते हैं, ''हमारे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था. शुरू के दो तीन दिन हमने खुले आसमान के नीचे गुज़ारे. इस दौरान भीषण गर्मी ने हमें इन बिलों को बनाने को प्रेरित किया.'' उन्होंने कहा,''हम हर दिन इस दहशत में जी रहे हैं कि फिर कोई जानलेवा तूफ़ान कभी भी आ सकता है. ऐसे में हमारे लिए इससे सुरक्षित कोई जगह नहीं हो सकती".

    अररिया ज़िला नेपाल की सीमा से सटा हुआ है. यह बिहार के सबसे पिछड़े इलाक़ों में से एक है. कुसियार गाँव राष्ट्रीय राज्यमार्ग से तीन किलोमीटर की दूरी पर है. वहाँ पहुँचने के लिए इंसान और जानवरों के पैरों के निशान ही रास्ता बताते हैं. बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी की एक सहायक नदी के किनारे बसे इस गाँव में बरसात के दिनों में नाव से ही पहुँचा जा सकता है.

    संथाली टोला में जनजातियों के क़रीब साठ परिवार आबाद हैं. इन लोगों ने अपने लिए 10-12 बिल बनाए हैं. इन बिलों में वे अपने बच्चों के साथ बकरियों को भी रखते हैं. जोजों टुड्डू और बोढ़न हांसदा के बच्चे भूख और गर्मी से बीमार हो गए हैं. उन्हें प्रशासन की ओर से अबतक न तो दवा मिली है और न ही खाने को अनाज.

    मुश्किल ज़िंदगी

    जोजों कहते हैं, ''हम भुखमरी के शिकार हैं आँधी ने हमारे चाँपाकलों (हैंडपंप) को भी तहस-नहस कर दिया है. इससे अब पानी का इंतजाम भी बहुत मुश्किल से होता है.'' उन्होंने कहा, ''सरकार से न तो हमें अब तक कोई रहत सामग्री नहीं मिली है.''

    गाँव के प्रधान लक्ष्मी ऋषिदेव बताते हैं, ''हमें आश्चर्य है कि सरकार की घोषणाओं के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने हमारे गाँव की अबतक सुध नहीं ली है. अब लोग उग्र होते जा रहे हैं." इस संबंध में प्रशासन का अपना तर्क है. प्रखंड विकास अधिकारी नागेंद्र पासवान कहते हैं कि अभी नुक़सान का सर्वेक्षण हो रहा है.

    वहीं सर्कल इंस्पेक्टर अमरनाथ सिंह कहते हैं कि उन्हें अगले तीन दिन में सर्वेक्षण ख़त्म कर के राहत सामग्री वितरित की जाए. उन्होंने बताया कि वे लोग भी अपने लिए राहत सामग्री मांग रहे हैं जिनका कुछ नुक़सान भी नहीं हुआ है. गाँव के प्रधान कहते हैं कि उन्हें अबतक राहत सामग्री का इंतज़ार है. उन्होंने बताया कि अभी तक कोई भी पदाधिकारी हमे देखने तक नहीं आया है तो धांधली का सवाल ही कहाँ है. संथाली जनजातियों का यह टोला सरकारी जमीन पर 50 साल पहले ही आबाद हुआ था. उनके पूर्ज रोज़गार की तलाश में यहाँ आए थे.

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