'जवानों ने युद्ध नियमों को नजरअंदाज किया'

रायपुर, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में मंगलवार को नक्सलियों के हाथों क्रूरता के साथ मारे गए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (केरिपु) के जवानों के बारे में ऐसा लगता है कि वे स्वेच्छया मौत के मुंह में जाने के लिए ही उस इलाके में कदम रखे थे, क्योंकि नक्सलियों के इस गढ़ में अभियान पर निकले इन जवानों ने युद्ध के सभी कानून-कायदों को ताक पर रख दिया था।

आतंक निरोधी एक अधिकारी ने मंगलवार को कहा कि बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिले में घटी इस खौफनाक घटना को रोका जा सकता था, बशर्ते कि इन जवानों ने युद्ध मैनुअल के 48 कानून-कायदों का पालन किया होता। जबकि नक्सलियों के खिलाफ अभियान के दौरान इन नियमों का पालन करने के लिए जवानों को सख्त निर्देश दिया गया था।

हमले का शिकार हुई केरिपु की 120वीं टुकड़ी ने एक तरह से 12 जुलाई, 2009 को छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में घटी घटना के दौरान हुई गलती को ही दोहराया है। सुरक्षा कर्मी उस समय नक्सलियों के जाल में फंस गए थे, जब वे दूरवर्ती जंगली इलाके में वाहनों पर सवार होकर जा रहे थे। जबकि बारूदी सुरंग संवेदी जंगली इलाकों में वाहनों की सवारी करने की मनाही है।

उस समय भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी सहित 29 पुलिस कर्मी मारे गए थे। मंगलवार की घटना के संदर्भ में भी केरिपु के जवानों ने युद्धक नियमों को दरकिनार का ठीक उसी तरह की गलती दोहराई और परिणाम स्वरूप 75 जवानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

बस्तर स्थित आतंक निरोधी एवं जंगली युद्ध महाविद्यालय (सीटीजेडब्ल्यूसी) के निदेशक बी.के.पोंवार ने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में कहा, "मैंने हमेशा कहा है कि पुलिस कर्मियों को जंगली मार्गो पर कभी भी वाहन से यात्रा नहीं करनी चाहिए और उन्हें हमेशा बारूदी सुरंग निस्तेजी दस्ते और खोजी कुत्तों को साथ में रखना चाहिए।"

पुलिस मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया है कि केरिपु की टुकड़ी जंगल में आंख मूंद कर वाहन की सवारी कर रही थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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