..इस मंदिर में दलित होता है पुजारी

लखनऊ, 24 मार्च (आईएएनएस)। समाज में भले ही सदियों से दलितों को मंदिरों से और पूजा-पाठ से दूर रखा जाता रहा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के 200 साल पुराने एक मंदिर का पुजारी दलित ही होता आया है।

इटावा जिले के लखना कस्बे में स्थित प्राचीन काली मां मंदिर की परंपरा है कि इसका पुजारी इलाके के एक दलित परिवार का ही कोई-न-कोई सदस्य होता है।

स्थानीय निवासी 63 वर्षीय सर्वेश्वर शाक्य ने आईएएनएस से कहा कि यमुना नदी के तट पर स्थित लगभग 200 साल पुराने इस काली मंदिर में पूजा-अर्चना का काम एक ही दलित परिवार की चौथी पीढ़ी कर रही है। वर्तमान समय में दो सगे भाई अखिलेश (45) एवं अशोक (43) मंदिर के पुजारी हैं।

शाक्य कहते हैं कि मंदिर का निर्माण तत्कालीन लखना रियासत के राजा जयपाल सिंह ने करवाया था। उनकी काली मां में बहुत आस्था थी। एक बार उन्होंने स्वप्न देखा कि यमुना किनारे स्थित पुराने सूखे पीपल के पेड़ के नीचे काली मां की मूर्ति गढ़ी है।

राजा ने उस सूखे पीपल के पेड़ को कटवाया तो उसमें से मूर्ति निकली। फिर उन्होंने उसी जगह पर भव्य और विशाल काली मंदिर की स्थापना करवा दी।

स्थानीय गोकरन बाजपेई(60) ने कहा कि मंदिर निर्माण के दौरान राजा जयपाल ने अपनी रियासत के सवर्ण जाति के जिस मुलाजिम को मंदिर निर्माण का काम सौंपा था, उसने मजदूरी करने वाले एक दलित मजदूर के साथ दुर्व्यवहार किया, जिसे देखकर वह बहुत दुखी हुए और उन्होंने महसूस किया कि दलितों को समाज में सम्मान नहीं मिलता और उन्हें हीन भावना का अहसास होता है। बस यही सोचकर उन्होंने एक नया इतिहास रचने का ऐलान कर दिया। काली माता के मंदिर का पुजारी यही दलित मजदूर और उसके परिवार के सदस्य होंगे।

दलित छोटेलाल मंदिर के निर्माण के साथ ही पुजारी बने। तब से लेकर आज तक इस मंदिर की पूजा पूजा-अर्चना का काम उनका ही परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी कर रहा है।

दलित पुजारी के प्रति लोगों में सम्मान का भाव है और इस प्रथा से समाज के सवर्ण वर्ग अथवा ब्राह्मणों को भी कोई गुरेज नहीं है। दूर-दूर से हर वर्ग के लोग आकर काली मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। परंतु आज तक के इतिहास में किसी ने भी दलित पुजारी के मुद्दे को लेकर अपना विरोध दर्ज नहीं कराया है।

मंदिर के वर्तमान पुजारी अशोक कहते हैं कि हमारी पीढ़ियां राजा जयपाल की ऋणी रहेंगी, जिनके उपकार की बदौलत हमारी चार पीढ़ियों को इतना आदर मिला। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु हमें बहुत सम्मान और आदर देते हैं। लोगों ने हमें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि हम दलित हैं।

स्थानीय लोग इस काली मंदिर को समता की एक मिसाल मानकर गर्व महसूस करते हैं। ग्रामीण दीनानाथ सिंह कहते हैं कि वह इस परंपरा का सम्मान करते हैं। यह परंपरा आपसी सद्भाव की एक मिसाल है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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