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महाकुंभ: हर-हर गंगे से विभोर विदेशी

By Staff
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हर-हर गंगे से विभोर विदेशी

शालिनी जोशी

हरिद्वार से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

यूं तो इस समय भारत के आईटी प्रोफेशनल्स पूरी दुनिया में अपना डंका बजा रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि विदेशियों की निगाह में अब भी गंगा और साधु-संत भारत की छवि के प्रमुख प्रतीक हैं.

हरिद्वार के महाकुंभ में अब तक दो शाही स्नान संपन्न हो चुके हैं और इसमें हजारों की संख्या में विदेशियों ने भी हिस्सा लिया. यहां तक कि इस बार महाकुंभ में अब तक दो विदेशी संन्यासियों को महामंडलेश्वर की पदवी से भी नवाजा जा चुका है.

साधु-संतों की शाही सवारी वैसे ही भव्य और विचित्रता से भरी होती और उसमें अगर गोरे लोग हों तो जाहिर आकर्षण और बढ़ जाता है. रामनामी चादर, गले में रूद्राक्ष और हाथों में गीता और मुख पर गंगा मइया और हर-हर गंगे से विभोर हो रहे विदेशी इन दिनों महाकुंभ में एक आम दृश्य है. कुछ के लंबी जटाएं भी हैं.

विदेशियों का कुंभ

लेकिन महाकुंभ और गंगा स्नान के इस पर्व का विदेशियों के लिये क्या मतलब है? इस सवाल का जवाब देते हैं फिलाडेल्फिया से आए जेफ़ डैनामिन, "मैं ये देखना चाहता था कि लोग एक नदी को कैसे इतनी श्रद्धा देते हैं और जब मैं यहां आया तो स्वयं ही गंगा की पवित्रता का कायल हो गया."

जैफ की पत्नी आग्या पेरू की हैं और उनके मुताबिक उनके लिए ये एक अध्ययन दौरा है. उनका कहना था,"मैंने गंगा के प्रदूषण के बारे में काफी पढ़ा सुना था लेकिन यहां तो निर्मल वातावरण है." महाकुंभ में आनेवाले कुछ विदेशी सैलानी हैं तो कुछ हिंदू धर्म से प्रभावित हैं.

कुछ के लिए कुंभ का मेला ही अपने आप में कौतुक है. ब्रिटेन से आए शौकिया फोटोग्राफर साइमन का कहना है,"मैं यहां दुनिया के इस सबसे बड़े मेले की तस्वीर उतारना चाहता था.ये बहुत रोमांचक अनुभव है."

जर्मनी से आए उगाथुश्च ने पहले बौद्ध धर्म में दीक्षा ली लेकिन अब वो 3 सालों से हिंदू धर्म के संन्यासी हैं. उनका कहना है कि ,"संन्यास अपनाकर उन्हें असीम शांति मिली है."

एक अनुमान के मुताबिक इस समय हरिद्वार के गौरीशंकर इलाके में बने सभी 13 प्रमुख अखाड़ों के शिविर में करीब 25-30 हजार विदेशी रह रहे हैं. इनमें से अधिकांश ब्रिटेन,अमरीका ,जर्मनी और फ्रांस के हैं. उनके लिये ये भारतीय संस्कृति को करीब से समझने का मौका भी है. फ्रांस से आई एक युवती कहती है कि गंगा और भारतीय संस्कृति सचमुच महान है.

हांलाकि कई स्थानीय लोगों का ये भी मानना है कि साधुओं की एक खास जीवन शैली और खान-पान भी विदेशियों की बढ़ती रूचि का एक प्रमुख कारण है और शुद्ध धार्मक भावना से यहां आनेवाल कम ही लोग हैं. लेकिन महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव महंत रवींद्रपुरी का कहना है कि ये सनातन धर्म के बड़प्पन औऱ महानता का प्रतीक है कि इतनी बड़ी संख्या में विदेशी महाकुंभ के स्नान शामिल हो रहे हैं .

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