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एक चरमपंथी की दास्तान

By Staff
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Pakistan
पाकिस्तान में बीबीसी संवाददाता अली सलमान ने एक चरमपंथी से बात की और उसके दिल का हाल सुना. प्रस्तुत है इस बातचीत के अंश चरमपंथी अमजद बट की ज़ुबानी. पहले मैं बहुत बिगड़ा हुआ था और नशे का भी बहुत ज़्यादा आदी था. उसके बाद मैं पकड़ा गया और अटक जेल में सात महीने गुज़ारे, फिर मैंने कैमेल जेल से रिहाई पाई.

जब मैं गांव आया तो मरी में इजतेमा हुआ था, लड़के कहने लगे कि चलो तो मैं भी उनके साथ चला गया. वहां उन्होंने मुझे अल्लाह और अल्लाह के रसूल की बातें बताईं. मैंने सुन कर कहा कि ये लोग तो बिल्कुल ठीक बातें करते हैं. मुझे भी अल्लाह और अल्लाह के रसूल के हुकुमों पर चलना चाहिए. फिर मैं उनके साथ चला गया.

मैं उनके साथ अफ़ग़ानिस्तान चला गया जहां एक सूबे में हमारी ट्रेनिंग हुई. हम तीन आदमी थे. अजमल बट, अलक़मा भाई और तीसरा मैं यानी अमजद बट. अलक़मा भाई कश्मीर में शहीद हो गए.

पीछे न रह जाएं

हम तीन लड़के जब उधर गए तो हमारे ख़ानदान के सारे लड़के कहने लगे कि ये लोग तो अल्लाह के रास्ते पर निकल गए हम कहीं उनसे पीछे न रह जाएं. हमारे जाते ही हमारे गांव के 50 लड़के हमारे पीछे आ गए जिनमें कई मेरे ख़ानदान के अलावा कई और बिरादरी के लोग भी शामिल थे. पूरे गांव के 50 लोगों ने जाकर सूबा कूनन में ट्रेनिंग ली.

हम वहां से कश्मीर चले गए और फिर वहां हमें बॉर्डर कार्रवाई का सौभाग्य मिला. बॉर्डर पर कार्रवाइयां करने के बाद हम फिर वापस आ गए. हमने अपने ट्रेनिंग देने वालों से कहा कि अब हमें लॉंच कर दें तो उन्होंने कहा कि अभी छह महीने की और ट्रेनिंग करो फिर हम आपको लॉंच कर देंगे. उसके बाद हमने छह महीने की ट्रेनिंग की. हमारे कुछ साथी चले गए. मैं न जा सका, मैं वापस आ गया.

हमने केएल सेक्टर पर कार्रवाई की. वहां उनका एक बड़ा असलहाख़ाना था. हमने कैप्टेन ज़हीर नाम के आदमी के नेतृत्व में कार्रवाई की थी. इसमें 13 लड़कों ने हिस्सा लिया था. हमनें रात को सात बजे वहां कार्रवाई की थी. हमने रॉकेट फ़ायर किए जिनमें सात हिंदू मरे थे. फिर हम वापस आ गए. हम ये नहीं कह सकते कि वो हमारी गोली से मरे थे या किसी और की गोली से.

लॉंच और बॉर्डर कार्रवाई

लॉंच उसे कहते हैं जिन्हें भारतीय कश्मीर के अंदर भेजा जाता है, वे सारे मुजाहिदीन होते हैं. हम उनके साथ जा कर मिल जाते हैं और कार्रवाइयां करते हैं. बॉर्डर कार्रवाई में हम लोगों को पोस्ट किया जाता है जहां कार्रवाइयां करके हम फिर वापस आ जाते हैं. हमें बॉर्डर कार्रवाई का दो-तीन बार मौक़ा मिला है.

चूंकि फ़ौज अपना काम नहीं करती है इसीलिए हमें कार्रवाई करनी पड़ती है. अगर फ़ौज अपना काम करे तो हमें कार्रवाई करने की क्या ज़रूरत है. भारतीय कश्मीर में इतना ज़ुल्म होता है. वो फ़ौज ही करती है. हमारी (पाकिस्तानी) फ़ौज का काम है कि वह उन्हें रोके. जब वह नहीं रोकती है तो हमें रोकना पड़ता है.

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