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कौन देगा गांव की बेटियों को सुरक्षा?

By अजय मोहन
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Village Girls
उत्‍तर प्रदेश के बागपत जिले के एक गांव में ग्‍यारहवीं कक्षा की छात्रा जो अपने गांव से कई मील दूर पढ़ने जाती है, घर लौट रही थी। खेतों के बीच से निकलते हुए सन्‍नाटे वाले रास्‍ते में उसी की कक्षा के तीन युवकों ने उसे अगवा कर लिया और पास में ही एक खंडहर में ले जाकर उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला।

यह घटना 26 फरवरी की है। उसी के ठीक दो दिन पहले यूपी के ही बांदा जिले में पांच युवकों ने उसी के घर में घुस कर उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला। यह भी एक छोटे से गांव की ही घटना है। उत्‍तर प्रदेश के हरदोई जिले के सेहरामऊ गांव में मात्र 11 साल की बच्‍ची पड़ोसी के घर टीवी देखने गई, तो पड़ोसी के पड़ोसी के 22 वर्षीय युवक ने उसके साथ बलात्‍कार कर डाला।

ये तो महज तीन घटनाएं हैं, लेकिन सच पूछिए तो गांव हमारी बहनों और बेटियों के लिए कतई सुरक्षित नहीं हैं। जी हां उत्‍तर प्रदेश ही नहीं देश के लगभग सभी राज्‍यों के ग्रामीण क्षेत्रों में तमाम विकास कार्यों के बाद भी अपराध कम नहीं हुआ है।

रेप के मामलों में यूपी तीसरे नंबर पर

बलात्‍कार की वारदातों के वर्ष 2007 के आंकड़ों में देश भर में कुल 20,737 मामले दर्ज हुए, जिनमें उत्‍तर प्रदेश 1648 मामलों के साथ तीसरे स्‍थान पर रहा। मध्‍य प्रदेश पहले और पश्चिम बंगाल दूसरे स्‍थान पर रहे। राष्‍ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक उत्‍तर प्रदेश में महिला हिंसा तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2008 में महिला हिंसा के 21,215 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1532 बलात्‍कार के मामले थे।

खास बात यह है कि ये आंकड़े वही हैं, जो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं। जबकि सही मायने में ऐसी तमाम वारदातें हैं, जो कहीं दर्ज नहीं। इनके कारण हम, आप और सभी जानते हैं कि बलात्‍कार के बहुत सारे मामले सिर्फ बदनामी के डर से दर्ज नहीं होते।

यदि शहर और गांव दोनों की तुलना करें तो शहर से ज्‍यादा गांव की बेटियां असुरक्षित हैं। शहर में सुबह से रात तक यातायात के साधन, जगह-जगह पुलिस चौकियां और दिन ढलने पर सड़कों पर स्‍ट्रीट लाइट। यही नहीं प्रशासन के दबाव के चलते शहरों में पुलिस का गश्‍त भी ज्‍यादा रहता है। वहीं अगर गांव की बात करें तो सुबह स्‍कूल जाने से लेकर शाम को घर लौटने के बाद तक लड़कियां असुरक्षित रहती हैं। यही नहीं यदि घर पर लड़की अकेली है, तो भी वो सुरक्षित नहीं, क्‍योंकि कब आपके दुश्‍मन घर पर धावा बोल दें कुछ पता नहीं।

सुबह से रात तक हर समय खतरा

सुबह तड़के जब लड़कियां उठकर खेतों में शौच के लिए जाती हैं, तब अपने साथ किसी बड़ी महिला को लेकर जाती हैं, क्‍योंकि वो जानती हैं, कि मानव रूपी दरिंदे कहीं भी घात लगाकर बैठे मिल सकते हैं। स्‍कूल, कॉलेज या नौकरी के लिए घर से निकलते ही अगर रास्‍ते में खेत पड़ते हैं, तो खतरा। लौटने में अगर देर हो गई, तो खतरा और ज्‍यादा खतरा। किसी भी पल यहां बेटियां सुरक्षित नहीं हैं।

लड़कियों की सुरक्षा पर हमने जब लखनऊ विश्‍वविद्यालय के विमेन्‍स स्‍टडीज़ विभाग के लेक्‍चरर डा. अमित कुमार

पाण्‍डेय से बात की तो उन्‍होंने कहा कि गांव में लड़कियों के लिए ऐसे खतरे तबतक नहीं खत्‍म हो सकते जब तक कानून व्‍यवस्‍था सुदृढ़ नहीं होगी। डा. पाण्‍डेय का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में महिला हिंसा के अधिकांश मामले दबने का कारण सिर्फ बदनामी का डर ही नहीं है, बल्कि दबंगों का वर्चस्‍व भी है। और तो और यदि आरोपी की पुलिस से अच्‍छी जान पहचान है, तो कई बार मामले दर्ज ही नहीं होते। ये सभी साक्षरता की कमी और अधिकारों के प्रति अज्ञानता के कारण है।

डा. पाण्‍डेय ने आगे कहा, "हाल ही में उत्‍तर प्रदेश के गांवों पर हुए अध्‍ययन में यह पता चला है कि जिन गांवों में महिला सरपंच होती हैं, वहां इस प्रकार की वारदातें कम हुई हैं। इसलिए मेरी राय में ज्‍यादा से ज्‍यादा गांवों में महिला सरपंच की सीटें आरक्षित होनी चाहिए।"

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