नई नहीं है महाबोधि मंदिर प्रबंधन समिति कानून में संशोधन की मांग

कानून में संशोधन की मांग सबसे पहले वर्ष 1977 में उठी थी। बौद्ध भिक्षुओं के मुताबिक तब अखिल भारतीय बोधगया मुक्ति आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भंते आनंद ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों तक धरना दिया था।

बौद्ध भिक्षुओं का कहना है कि जब मुस्लिमों के मक्का-मदीना, हिंदुओं के तिरूपति बालाजी में ऐसे कानून नहीं हैं तो महाबोधि मंदिर में ऐसा क्यों हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायियों का कहना है कि इस कानून में संशोधन कर मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह बौद्धों के हाथों में सौंपा जाए। बौद्धों की मांग है कि बिहार सरकार विधानसभा से इस कानून में संशोधन के लिए प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजे।

इस वर्ष यह आंदोलन तेज हो गया है। जनवरी में जहां छह बौद्ध भिक्षुओं ने बोधगया में 10 दिनों तक अनशन किया वहीं 24 फरवरी को बौद्ध भिक्षुओं ने पटना में रैली निकालकर राज्यपाल को एक मांग पत्र सौंपा।

उल्लेखनीय है कि बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति कानून 1949 में प्रावधान है कि इस मंदिर के प्रबंधन के लिए नौ सदस्यीय समिति होगी। इसमें चार बौद्धों (भारत के निवासी) के अलावा बोधगया महंत सहित चार हिंदू सदस्य होंगे जबकि गया के जिलाधिकारी समिति के अध्यक्ष होंगे। प्रावधान के मुताबिक जिलाधिकारी अगर गैर हिंदू होंगे तो वैसी स्थिति में किसी हिंदू को सरकार अध्यक्ष मनोनीत करेगी। इन्हीं सदस्यों में से एक सचिव को नियुक्त किया जाता है। यह समिति तीन वर्ष के लिए मनोनीत होती है।

आंदोलन से जुड़े प्रियपाल भंते ने आईएएनएस को बताया कि वर्ष 1990 में उच्चतम न्यायालय में भी इस कानून में संशोधन को लेकर एक याचिका दायर की गई थी परंतु सरकार ने वार्ता करने की बात कहकर इसे वापस करवा लिया था परंतु अब तक कुछ नहीं किया गया है। उन्होंने दावा किया कि प्राचीन महाबोधि मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेवारी बौद्धों को मिलने से इस मंदिर के प्रबंधन में सुधार आएगा और पर्यटकों की संख्या में भी वृद्घि होगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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