महंगाई के मुद्दे पर केंद्र व गैर कांग्रेसी राज्य आमने-सामने (लीड-4)
प्रधानमंत्री ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि महंगाई रोकने में उनकी सरकार को सीमित सफलता मिली है। हाल के दिनों में खाद्य पदार्थो की कीमतों में गिरावट आई है और यह जारी रहने की उम्मीद है। उन्होंने दावा किया कि खाद्य महंगाई का सबसे बुरा दौर बीत चुका है।
उन्होंने कहा, "रोजगार संरक्षित रखने में हमने अच्छा काम किया लेकिन खाद्य पदार्थो की महंगाई रोकने में हमें ज्यादा सफलता नहीं मिली।"
रियायती दर की दुकानों के माध्यम से वितरण के लिए अतिरिक्त अनाज जारी करने जैसे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कदमों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, "अंत में मैं कहना चाहूंगा कि जहां तक खाद्य वस्तुओं की महंगाई का सवाल है, सबसे बुरा दौर बीत चुका है।"
प्रधानमंत्री ने कहा कि महंगाई रोकने में राज्य सरकारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें केंद्र से जारी खाद्य वस्तुओं की जरूरतमंद लोगों तक शीघ्र पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए।
सिंह ने कहा, "मेरे विचार से कुछ राज्यों को छोड़कर हमारी वितरण प्रणाली पुरानी हो गई है और इसमें आमूल बदलाव की आवश्यकता है। राज्य सरकारों को विकसित हो रहे बाजार हस्तक्षेप तंत्र पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पूरक के रूप में काम कर सकता है। राज्यों के नागरिक आपूर्ति निगमों और निदेशालयों को बहुत मजबूत करने की आवश्यकता है।"
सिंह ने दीर्घकालिक संदर्भ में कम उत्पादकता के कारणों पर ध्यान देने को कहा। उन्होंने कहा कि दालों सहित कई फसलों जिनकी आपूर्ति कम है, की प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाने की बड़ी संभावना है।
सिंह ने बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर अस्थाई रोक लगाने तथा राज्य सरकारों से वे सभी कदम उठाने का आग्रह किया जिनसे गरीबों पर बोझ न बढ़े।
प्रधानमंत्री ने जमाखोरी रोकने के लिए राज्य सरकारों से आवश्यक वस्तु रखरखाव कानून लागू करने और वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्रियों को आयातित कच्ची चीनी के प्रसंस्करण की सभी बाधाओं को भी दूर करना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों ने चीनी मिलों में कच्ची चीनी का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया है।
गैर कांग्रेसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाद्य वस्तुओं की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृद्धि के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा है कि केंद्र के पास इससे निपटने के लिए आवश्यक सामूहिक दृष्टि का अभाव है।
मोदी ने सम्मेलन से इतर पत्रकारों से चर्चा में कहा, "महंगाई से निपटने के लिए जिस सामूहिक दृष्टि की आवश्यकता है, केंद्र सरकार के पास उसका अभाव है। राज्य सरकारें सक्रियता से कदम उठाने को तत्पर हैं लेकिन केंद्र के पास दृष्टि का अभाव है।"
इस बैठक को बहुत पहले बुलाए जाने की आवश्यता जताते हुए मोदी ने कहा, "बढ़ती महंगाई रोकने के लिए केंद्र सरकार को एक कार्य योजना लेकर आने की जरूरत थी लेकिन इसके बावजूद सरकार इस बैठक में ऐसी कोई कार्य योजना लेकर नहीं आई।"
चर्चा के दौरान मोदी की वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से तीखी बहस भी हुई। मोदी ने जब यह सवाल उठाया कि कांग्रेस ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए तीन रुपये की रियायती दर से चावल और गेहूं देने का वादा किया था। इस पर हस्तक्षेप करते हुए मुखर्जी ने मोदी पर राजनीति करने का आरोप लगाया। मोदी ने इस पर पलटवार भी किया।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा ने कहा कि केंद्र सरकार की नाकामी का दोष राज्यों पर थोपना दुर्भाग्यपूर्ण है।
केरल के मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन ने कहा कि चावल, गेंहू और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में केंद्र सरकार के सुधार नहीं करने के कारण महंगाई बढ़ रही है।
उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा कि महंगाई एक 'राष्ट्रीय समस्या' है। इसके लिए राज्यों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और इससे केंद्र सरकार को निपटना चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खाद्यान्नों का आवंटन बढ़ाने की मांग की।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा, "उपयुक्त योजना की कमी और केंद्र सरकार में निश्चय का अभाव होने के कारण महंगाई बढ़ रही है।"
उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थो की उपलब्धता और कमी तथा बाजार में उनकी मांग पर नजर रखने के लिए केंद्र सरकार को एक प्रकोष्ठ का गठन करना चाहिए।
पोखरियाल ने संकेत दिया कि मौजूदा महंगाई कृत्रिम तरीके से पैदा की गई है। उन्होंने कहा कि चीनी को पहले 17 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर निर्यात किया गया और बाद में उसे 44 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से आयात किया गया।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंचाई परियोजनाओं में उपयुक्त निवेश न करने को महंगाई का कारण बताया।
बहरहाल, लोग प्रधानमंत्री की इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि दूध, चीनी और दालों जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें एक वर्ष पहले की तुलना में करीब दोगुनी हुई हैं।
दिल्ली में एक गृिहणी लीला गणेशन ने कहा, "जब दाल 80 रुपये किलोग्राम हो और एक केला चार रुपये में मिले तो हम इस बारे में क्या कह सकते हैं? मेरे राशन का बजट दोगुना हो चुका है और इसके कम होने का कोई संकेत नहीं है।"
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के.जोशी ने कहा, "सरकार क्या कह रही है इस बारे में मैं निश्चित नहीं हूं। मैं कह सकता हूं कि हाल के महीनों में जितनी तेजी से कीमतें बढ़ी हैं उतनी तेजी से कम नहीं होंगी।"
देश में खाद्य महंगाई के 17.56 प्रतिशत पर पहुंचने की पृष्ठभूमि में यह एक दिवसीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में आलू की कीमत में 50 प्रतिशत, चावल के दाम 11 प्रतिशत, गेंहू की कीमत 16 प्रतिशत और दूध के दाम 14 प्रतिशत बढ़ चुके हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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