प्रधान न्यायाधीश का पद आरटीआई के दायरे में : उच्च न्यायालय (लीड-2)

नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में अपनी एकल पीठ के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें देश के प्रधान न्यायाधीश के पद को भी सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में बताया गया था। अदालत ने कहा कि खुलापन संक्रमण की सर्वोत्तम दवा है।

मुख्य न्यायाधीश अजित प्रकाश शाह, न्यायमूर्ति एस.मुरलीधर तथा न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने कहा, "न्यायपालिका की जवाबदेही को अलग से नहीं देखा जा सकता। इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें शासक जनता के प्रति पारदर्शी, सुलभ और प्रभावी तरीके से जवाब देने के लिए जवाबदेह होते हैं। लोकतंत्र खुलेपन की मांग करता है और खुलापन मुक्त समाज का सहवर्ती है। धूप सर्वोत्तम संक्रमण रोधी है।"

खण्डपीठ ने कहा, "अधीनस्थ न्यायपालिका पहले ही संपत्तियों की घोषणा कर रही है। इसलिए जब वे जवाबदेह हैं तो हम भी जवाबदेह हैं। इस प्रकार न्यायपालिका में जो जितना बड़ा है, जनता के प्रति उसकी जवाबदेही उतनी ही बड़ी है।"

फैसला सुनाते समय न्यायाधीशों ने आश्वस्त किया कि वे भी अगले सप्ताह अपनी संपत्तियों की घोषणा करेंगे।

खण्डपीठ ने अपने 88 पृष्ठों के फैसले में कहा, "सूचना एक ऐसी मुद्रा है, जिसकी जरूरत सामाजिक शासन और जीवन में हर नागरिक को होती है।"

आरटीआई के महत्व पर जोर देते हुए खंडपीठ ने कहा कि आरटीआई का प्रभाव बहुत अधिक है। ऐसी जानकारी चाहने वाले नागरिकों को इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बची रहेगी।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा, "आयकर विवरणी और चिकित्सा दस्तावेजों का खुलासा आरटीआई के तहत नहीं किया जाएगा लेकिन यदि इससे जनहित जुड़ा हो तब इसका भी खुलासा किए जाने की आवश्यकता होगी।"

वर्ष 1997 और 1999 में दो प्रस्तावों में कहा गया है कि न्यायाधीशों के लिए संपत्तियों की घोषणा बाध्यकारी नहीं वरन ऐच्छिक हो सकती है। इस संबंध में न्यायालय ने कहा, "प्रस्ताव को न्यायाधीशों की जवाबदेही के लिए बनाया गया है और हमें समान रूप से इसका पालन करना चाहिए।"

खण्डपीठ ने इस मामले पर नवंबर 2009 में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।

सर्वोच्च न्यायालय रजिस्ट्री की ओर से उपस्थित महान्यायवादी ई.वाहनवती ने तर्क दिया कि न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणा संबंधी प्रस्ताव गैर संवैधानिक, गैर बाध्यकारी है और यह किसी न्यायाधीश को देश के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने दो सितम्बर 2009 को इस विवादास्पद मुद्दे पर अपने फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का पद एक सार्वजनिक अधिकरण है और उसका पद भी पारदर्शिता के लिए बने कानून के दायरे में आता है।

यह फैसला प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन के रुख के विपरीत है। बालाकृष्णन लगातार कहते रहे हैं कि उनका पद आरटीआई कानून के दायरे से बाहर है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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