जीत को चुनौती देने के लिए पुख्ता सबूत जरूरी : न्यायालय
राणा अजीत
नई दिल्ली, 30 नवंबर (आईएएनएस)। किसी चुनाव में कोई निकटतम प्रतिद्वंद्वी इस आधार पर मतों की दोबारा गिनती कराए जाने की मांग नहीं कर सकता कि उसके प्रतियोगी की जीत बेहद कम अंतर से हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में यह कहा है।
अदालत ने कहा है कि कोई भी प्रत्याशी मतों की गिनती में गड़बड़ी के पुख्ता सबूत के आधार पर ही अपने प्रतिद्वंद्वी की जीत को चुनौती दे सकता है। अदालत ने कहा कि जब तक मतों की गिनती में गड़बड़ी के पुख्ता सबूत पेश नहीं किए जाते, निचली अदालतों या चुनाव न्यायाधिकरणों को मतों की दोबारा गिनती कराए जाने की मांग पर विचार करने की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति डी.के जैन एवं न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा की खंडपीठ ने आंधप्रदेश के एक गांव के सरपंच द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया गया है। यह निर्णय 23 नवंबर को सुनाया गया, लेकिन फैसले की प्रति शनिवार को उपलब्ध कराई गई।
खंडपीठ ने कहा, "विजयी उम्मीदवार और दूसरा स्थान हासिल करने वाले उम्मीदवार के बीच मतों के मामूली अंतर का मतलब यह नहीं कि मतों की गिनती में गड़बड़ी हुई। इस आधार पर निकटतम उम्मीदवार मतों की दोबारा गिनती कराए जाने की मांग नहीं कर सकता। उसे यह साबित करना होगा कि मतों की गिनती में निश्चित तौर पर गड़बड़ी हुई।"
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के इस तर्क पर असहमति प्रकट करते हुए कि मामूली अंतर से जीत की सूरत में मतों की दोबारा गिनती से चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी होगी, अदालत ने कहा कि मतों की दोबारा गिनती कराए जाने से मतपत्र से जुड़ी गोपनीयता पर असर पड़ेगा।
अदालत ने आंध्र प्रदेश के रावीमेतला गांव के रहने वाले के. मुरली कृष्णा की याचिका पर यह फैसला सुनाया। उन्हें अगस्त 2006 में सरपंच के चुनाव में महज दो मतों से जीत मिली थी। उनकी जीत को उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी वी.कोटेश्वर राव ने निचली अदालत में चुनौती देकर मतों की फिर से गिनती कराए जाने का फैसला अपने हक में हासिल कर लिया। उच्च न्यायायल ने भी इस फैसले पर मुहर लगा दी, पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को पलट दिया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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