विकासशील देशों ने दबाव बढ़ाया

विकासशील देशों ने दबाव बढ़ाया

बीजिंग में विकासशील देशों ने तय किया है कि वे कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर होने वाली बैठक में अपना अलग मसौदा पेश करेंगे.

भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन ने शनिवार को ये तय किया कि कोपेनहेगेन उनका अलग एजेंडा होगा जिसमें विकासशील और गरीब देशों के हितों को ध्यान में रखा जाएगा.

इन चारों देशों ने अपने साथ जी-77 के देशों को भी लिया है.

बीजिंग स्थित वरिष्ठ पत्रकार शैबल दासगुप्ता का कहना है, "ये चारों देश अमरी देशों के मसौदे का मुकाबला करेंगे. इरादा ये है कि अगर धनी देश इनकी बात नहीं मानते तो ये चारों एक साथ वॉकआउट करेंगे."

बैठक में ये तय हुआ कि चारों देश उत्सर्जन में कटौती की कोई क़ानूनी बाध्यता स्वीकार नहीं करेंगे और विकासशील देश इस दिशा में ख़ुद जितना बनेगा उतना करेंगे.

बैठक के जिस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया उसमें क़ानूनी बाध्यता नहीं मानने के अलावा तीन अन्य विंदुए हैं.

आमेजन जैसे जंगलों के घटते दायरे के लिए धनी देशों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है और उनसे हरियाली बढ़ाने के लिए धन देने की माँग की गई है.

प्रस्ताव में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन या प्रदूषण के नाम पर विकसित देशों की ओर से किसी तरह की व्यापारिक बाधा को वे स्वीकार नहीं करेंगे.

शैबल दासगुप्ता कहते हैं, "विकसित देश अक़्सर विकासशील और गरीब देशों में बने कुछ सामानों पर ये कह कर प्रतिबंध लगा देते हैं कि इनके निर्माण के दौरान प्रदूषण फैलता है. इस पर इन चारों देशों ने कड़ा रूख़ अख़्तियार किया है."

अंतिम अहम बिंदु निरीक्षण से जुड़ा है. चारों देशों ने स्पष्ट किया है कि 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' नहीं देने के बावजूद अगर विकसित देश ग़रीब देशों में जलवायु परिवर्तन के लिए हो रहे प्रयासों का परीक्षण करना चाहेंगे तो उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी जाएगी.

विकासशील देशों ने कहा है कि इन चारों बिंदुओं पर किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे और अगर इन्हें दरिकानर कर विकसित देश कुछ करना चाहते हैं तो कोपेनहेगेन बैठक को सफल नहीं होने देंगे.

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