कोलकाता में मार्फीन की कमी से जूझ रहे हैं कैंसर मरीज
सौधृति भबानी
कोलकाता, 27 नवंबर (आईएएनएस)। कोलकाता में कैंसर के हजारों मरीज मार्फीन की भारी कमी से जूझ रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब मरीजों पर पड़ा है, क्योंकि वह इसके स्थान पर अन्य कोई दर्दनिवारक दवा नहीं खरीद सकते। यहां हर साल कैंसर के 12,000 नए मामले सामने आते हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस कैंसर अनुसंधान संस्थान के चिकित्सा निदेशक आशीष मुखर्जी ने आईएएनएस को बताया, "कैंसर के मरीजों में दर्द को नियंत्रित करने में मार्फीन बहुत असरकारक है। गरीब मरीजों के लिए इसके स्थान पर कोई और दवा ले पाना बहुत मुश्किल है।"
उन्होंने कहा, "पहले हम चितरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (सीएनसीआई) से मार्फीन लेते थे। इस संस्थान को अन्य कैंसर संस्थानों को दर्द निवारक दवाएं वितरित करने वाला नोडल एजेंट चुना गया था। लेकिन अब हमें उससे मार्फीन नहीं मिलती है।"
एक सूत्र का दावा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कुछ अनियमितताएं मिलने के बाद 2006 में सीएनसीआई को मार्फीन देना बंद कर दिया था।
पश्चिम बंगाल में हर साल कैंसर के करीब 75,000 नए मामले सामने आते हैं। इनमें से 12,000 मामले केवल कोलकाता के होते हैं।
मुखर्जी कहते हैं, "इनमें से 50 प्रतिशत मरीजों में कैंसर बढ़ी हुई अवस्था में होता है। हमारे लिए उनका दर्द कम करना मुश्किल हो गया है। जबकि कैंसर मरीजों के लिए यह सबसे जरूरी है।"
सीएनसीआई के निदेशक जयदीप बिस्वास का कहना है कि उनका संस्थान मार्फीन का संग्रह रखने के अपने लाइसेंस का नवीनीकरण कराने पर काम कर रहा था। उन्होंने कहा, "हमने मंगलवार को एक बैठक की और सीएनसीआई में मार्फीन संग्रह रखने के लिए लाइसेंस का नवीनीकरण कराना तय किया।"
काजल गोम्स नाम के एक थोक व्यापारी ने आईएएनएस को बताया कि एक महीने में मार्फीन की ज्यादा से ज्यादा 10,000 गोलियां रखी जा सकती हैं। इनसे केवल 50-100 मरीजों का इलाज संभव है। उन्होंने कहा कि मार्फीन की कमी बहुत ज्यादा है और इसकी संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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