मुंबई में एक शहादत को नहीं मिला कोई नाम

मुंबई के सीएसटी रेलवे स्टेशन पर सहायक मुख्य टिकट निरीक्षक के तौर पर तैनात सुशील कुमार शर्मा रोज की तरह 26 सितंबर 2009 को शाम चार से रात 12 बजे तक की ड्यूटी पर थे, तभी उन्हें रात लगभग 9़ 40 बजे गोलियों की आवाज सुनाई दी। उन्हें लगा कि अगर इस गोलीबारी के बीच कोई ट्रेन आ गई तो कई लोग मारे जा सकते है। वे इस गोलीबारी को गैंगवार का हिस्सा मान रहे थे।

शर्मा ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुख्य टिकट निरीक्षक के कार्यालय से निकलकर कंट्रोल रूम का रुख किया और ट्रेन को स्टेशन से बाहर ही रोकने की हिदायत दी। कुछ देर बाद गोलीबारी थम गई और वे कंट्रोल रूम से बाहर निकले। शर्मा ने कंट्रोल रूम से बाहर निकलते ही प्लेटफार्म पर एक बच्ची को तड़पते देखा तो वे उसकी ओर बढ़ गए। घायल बच्ची को उठाने से पहले ही वे आतंकवादियों की गोलियों का शिकार बन गए। आतंकियों ने बंदूकों में गोलियां भरने के लिए गोलीबारी रोकी थी। इसे सुशील नहीं समझ पाए।

सुशील के भाई महेंद्र शर्मा कहते है कि उनके भाई ने अपनी ड्यूटी निभाते जान गंवाई है, मगर उसे शहीद का दर्जा नहीं मिल पाया। एनडीटीवी ने जब उन्हें इंडियन आफ द ईयर 2008 चुना और परिजनों ने अपनी दास्तान तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को सुनाई, तब उनको मुआवजा मिला ।

महेंद्र शर्मा कहते है कि उन्हें इस बात का मलाल है कि उनके भाई की मौत को शहादत का दर्जा मिलना तो दूर, कोई नाम तक नहीं मिला है। वे सवाल करते है कि क्या सिर्फ वर्दी वाले को ही शहीद का सम्मान पाने का हक है? क्या दोनों की जान में फर्क है? या कुछ और वजह है? वे कहते हैं कि अगर ऐसा ही होता रहा तो सामान्य लोग शहादत देने से कतराने लगेंगे।

सुशील के परिजनों एवं मित्रों ने मिलकर सुशील कुमार शर्मा फाउंडेशन बनाया है जो बहादुर सिविलियन(आमजन) को 26 सितंबर को सिविलियन ब्रेवरी अवार्ड देकर सम्मानित करेगा।

पापा ने किया था केक काटने का वादा : सुशील कुमार शर्मा के छोटे बेटे आदित्य का 26 नवंबर को जन्म दिन था और वे उससे वादा करके गए थे कि ड्यूटी से लौटने के बाद केक काटेंगे। उन्होंने दो केक यह कहते हुए मंगाए थे कि एक केक दोस्तों के साथ काट लेना और दूसरा वे काटेंगे। महेंद्र शर्मा बताते है कि आदित्य उस रात की याद कर रो पड़ता है और कहता है कि अब केक कौन काटेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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