गुरु-शिष्य के रिश्तों पर डंडे की चोट (बाल अधिकार कंवेंशन दिवस पर विशेष)

भोपाल, 20 नवंबर (आईएएनएस)। शिक्षिका की पिटाई से छात्रा की मौत, पिटाई से छात्र का हाथ टूटना और दंड के तौर पर बच्चे को कमरे में बंद कर देना। ये ऐसी कुछ घटनाएं हैं जो मध्य प्रदेश के विद्यालयों में गुरु-शिष्य के कमजोर होते रिश्तों को उजागर करती हैं।

अभी हाल ही में भोपाल के सरस्वती विद्या मंदिर में शिक्षिका ने छात्र अनमोल कुशवाहा को इतना पीटा कि उसके बाएं हाथ में गंभीर चोट लग गई। अनमोल का शारदा अस्पताल में इलाज चल रहा है और विद्यालय इलाज का खर्च वहन कर रहा है, मगर शिक्षिका को दोषी मानने को तैयार नहीं है।

बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र में 20 नवंबर, 1989 को बाल अधिकार पर एक कंवेंशन किया गया था। इस कंवेंशन को हुए शुक्रवार को 20 साल हो गए। इसके बावजूद बच्चों का उत्पीड़न और उन पर हिंसा का दौर नहीं थम रहा है।

गैर सरकारी संस्था विकास संवाद के सचिन जैन का कहना है कि अनुशासन और बच्चों को सीख देने के नाम पर हिंसक व्यवहार किया जाता है। इस व्यवहार से बच्चों के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने कई बार निर्देश जारी किए मगर कोई बात नहीं बनी।

मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. रूमा भट्टाचार्य का कहना है कि बच्चों पर हिंसा की कई वजहें है। एक तरफ मां-बाप का बच्चे पर दबाव है तो दूसरी ओर शिक्षक के सामने 40 से 50 बच्चों को अनुशासन में रखने की जिम्मेदारी होती है। इतना ही नहीं अपनी निजी परेशानी के चलते भी शिक्षक संयम खो बैठते हैं। इसी का नतीजा है कि बच्चे हिंसा का शिकार बनते हैं।

डॉ. भट्टाचार्य कहती हैं कि प्रदेश में शिक्षकों को काउंसलिंग देने जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। शिक्षक यह जानता ही नहीं है कि बच्चा क्या चाहता है और उसे क्या करना चाहिए। जरूरी है कि शिक्षकों की काउंसलिंग हो।

एक दशक से बच्चों के बीच काम कर रहे राजीव भार्गव का कहना है कि बच्चे वोटर नहीं हैं इसलिए वे किसी के एजेंडे में नहीं है। बच्चों के उत्थान और कल्याण की बातें तो बहुत होती है मगर बच्चों पर हिंसा की वारदातें कम नहीं हो रही है।

सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत दुबे कहते हैं कि क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट खेलते हुए 20 साल होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जाता है लेकिन बाल अधिकार कंवेंशन के 20 वर्ष पूरे होने पर कोई बच्चों पर हो रही हिंसा की चर्चा तक के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति चिंताजनक और दुखद है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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