समझौते के तहत गैस आपूर्ति से सरकार पर पड़ेगा बोझ : पेट्रोलियम मंत्रालय (लीड-1)
सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक तन्खा ने कहा, "निजी समझौते में कृष्णा गोदावरी बेसिन से निकलने वाली गैस के साथ-साथ नई खोजों को वर्तमान और भविष्य में दो पक्षों के बीच बांटने की बात परिकल्पित है।"
तन्खा ने कहा, "इससे बड़े स्तर पर जनता के हित में इस महत्वपूर्ण संसाधन का इस्तेमाल नहीं हो सकेगा।"
उन्होंने कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र में निवेश का जिक्र करते हुए कहा, "यह क्षेत्र में 75 हजार करोड़ रुपये के निवेश को निर्थक कर देगा और उर्वरक और तरल पेट्रोलियम गैस के आयात के माध्यम से सरकार पर बोझ बढ़ाएगा।"
इससे पहले अतिरिक्त महाधिवक्ता मोहन पारासरन ने कहा, "मुकेश अंबानी की कंपनी के साथ सरकार का उत्पादन बंटवारा समझौता कंपनी को गैस की आपूर्ति के मामले में किसी भी निजी समझौते से वंचित करता है।"
उन्होंने कहा, "समुद्र के नीचे और देश की सीमा के भीतर पानी के नीचे मौजूद सभी प्रकार के खनिज पदार्थो पर सरकार का एकाधिकार है।"
आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी बेसिन से निकलने वाली गैस की आपूर्ति व कीमत को लेकर अंबानी बंधुओं (मुकेश एवं अनिल) के बीच विवाद पर सुनवाई कर रही प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन, न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायाधीश पी. सथशिवम की खंडपीठ के समक्ष पारासरन ने कहा, "उत्पादन बंटवारा समझौते के मुताबिक गैस का मालिकाना हक आरआईएल को नहीं दिया जा सकता।"
उन्होंने कहा कि आरआईएल अपनी इच्छानुसार गैस की बिक्री नहीं कर सकती और न ही किसी विशेष पक्ष के लिए निश्चित मात्रा और समय सीमा तक गैस का भंडारण किया जा सकता।
वर्ष 2005 में अंबानी परिवार में बंटवारे के वक्त आरआईएल और अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (आरएनआरएल) के बीच एक निश्चित कीमत पर निश्चित मात्रा में निश्चित समय तक गैस की आपूर्ति का समझौता हुआ था। लेकिन आरआईएल ने बाद में समझौते को मानने से इंकार कर दिया।
आरएनआरएल के वकील राम जेठमलानी पहले ही इस विवाद में पेट्रोलियम मंत्रालय के एक पक्ष के रूप में शामिल होने का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय की अपील को अगर स्वीकार किया जाता है तो उसके (आरआईएल) अधिकारियों से पूछताछ की अनुमति मिलनी चाहिए।
गैस के बारे में सरकार की नीति का विस्तृत उल्लेख करते हुए पारासरन ने कहा कि आरआईएल को सरकार द्वारा तय कीमत पर गैस की आपूर्ति करना चाहिए। सरकार ने कीमत को तय करते वक्त वैश्विक कीमतों को ध्यान में रखा था।
वकील ने कहा कि जुलाई 2006 में पेट्रोलियम मंत्रालय ने आरआईएल के आरएनआरएल के साथ 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस की आपूर्ति समझौते को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा कि बंबई उच्च न्यायालय का आरएनआरएल के पक्ष में फैसला सरकार की कार्यकारी शक्तियों को निष्प्रभावी बनाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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