आरआईएल गैस को लेकर निजी समझौता नहीं कर सकती : पेट्रोलियम मंत्रालय
सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष पेट्रोलियम मंत्रालय की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता मोहन परासरन ने कहा, "समुद्र के नीचे और देश की सीमा के भीतर पानी के नीचे मौजूद सभी प्रकार के खनिज पदार्थो पर सरकार का एकाधिकार है।"
आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी बेसिन से निकलने वाली गैस की आपूर्ति व कीमत को लेकर अंबानी बंधुओं (मुकेश एवं अनिल) के बीच विवाद पर सुनवाई कर रही प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन, न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायाधीश पी. सथशिवम की खंडपीठ के समक्ष परासरन ने कहा, "उत्पादन बंटवारा समझौते के मुताबिक गैस का मालिकाना हक आरआईएल को नहीं दिया जा सकता।"
उन्होंने कहा कि आरआईएल अपनी इच्छानुसार गैस की बिक्री नहीं कर सकती और न ही किसी विशेष पक्ष के लिए निश्चिम मात्रा और समय सीमा तक गैस का भंडारण किया जा सकता।
वर्ष 2005 में अंबानी परिवार में बंटवारे के वक्त आरआईएल और अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड (आरएनआरएल) के बीच एक निश्चित कीमत पर निश्चित मात्रा में निश्चित समय तक गैस की आपूर्ति का समझौता हुआ था। लेकिन आरआईएल ने बाद में समझौते को मानने से इंकार कर दिया।
आरएनआरएल के वकील राम जेठमलानी पहले ही इस विवाद में पेट्रोलियम मंत्रालय के एक पक्ष के रूप में शामिल होने का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय की अपील को अगर स्वीकार किया जाता है तो उसके (आरआईएल) अधिकारियों से पूछताछ की अनुमति मिलनी चाहिए।
गैस के बारे में सरकार की नीति का विस्तृत उल्लेख करते हुए परासरन ने कहा कि आरआईएल को सरकार द्वारा तय कीमत पर गैस की आपूर्ति करना चाहिए। सरकार ने कीमत को तय करते वक्त वैश्विक कीमतों को ध्यान में रखा था।
वकील ने कहा कि जुलाई 2006 में पेट्रोलियम मंत्रालय ने आरआईएल का आरएनआरएल के साथ 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस की आपूर्ति समझौते को खारिज कर दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि बंबई उच्च न्यायायल का आरएनआरएल के पक्ष में फैसला सरकार की कार्यकारी शक्तियों को निष्प्रभावी बनाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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