जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा पूर्वोत्तर भारत
जलवायु परिवर्तन ने न केवल सूमी के परिवार को प्रभावित नहीं किया है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के उन सभी राज्यों पर अपनी छाप छोड़ी है, जो कभी बेहतरीन मौसम और जलवायु के लिए वरदान माने जाते थे।
सूमी ने आईएएनएस को बताया, "हम अपने परिवार का भरण पोषण रबी की फसल काटकर चलाते हैं। एक फसल काटकर हम पहले 100 बोरियां इकठ्ठा कर लेते थे, मगर जबसे मौसम ने अपना मिजाज बदला है, हम इसका मात्र 30 प्रतिशत ही कमा पाते हैं।"
जाहिर है सूमी की माली हालत कुछ ठीक नहीं है। उसने कहा, "इस बार जून-जूलाई में कोई बारिश नहीं हुई और सितम्बर में हुई वर्षा ने चावल की फसल को खराब कर दिया। खेतों में पौधे तो दिखते हैं, फूल भी खिलते हैं मगर उनमें अनाज का दाना नहीं होता।"
पैदावार न होने से परेशान सूमी और उसी की तरह पूर्वोत्तर भारत में रहने वाले तमाम किसानों को चावल के दाम बढ़ने से कुछ उम्मीद की रोशनी दिखी थी, मगर बिचौलियों की वजह से वह लाभ भी इन तक नहीं पहुंच पाता।
मथाई के अनुसार बिचौलिए उन्हें चावल की बहुत ही कम कीमत चुकाते हैं। मथाई जैसी और भी महिलाएं हैं जो खेती पर ही निर्भर हैं, जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं।
यह कहानी सिर्फ चावल के खेतिहरों का ही नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र में टमाटर, बींस और सेब की खेती करने वालों का भी यही हाल है।
'वादा न तोड़ो अभियान' एनजीओ की सदस्या संध्या वेंकटेश्वर ने कहा, "जलवायु परिवर्तन ने शहरी महिलाओं के मुकाबले गांव में रहने वाली महिलाओं को ज्यादा प्रभावित किया है, जिनकी रोजी-रोटी खेतों के भरोसे ही चलती है।"
अगर तालाब का पानी सूख जाए तो एक महिला को ही किसी दूसरे तालाब की तलाश करनी पड़ती है। घर में जलावन की लकड़ी का इंतजाम करना पड़ता है और चाहे जितना भी सूखा क्यूं न हो उन्हें सीमित संसाधनों में भी घर चलाना ही पड़ता है।
संध्या ने कहा, 'सूमी और मथाई जैसी 220 ग्रामीण महिलाओं को इस सप्ताह राजधानी लाया गया है, ताकि वे सरकार के सामने अपनी समस्याओं को रख सकें। वे सरकार से खेती करने के लिए नए तकनीकों की मांग कर रहे हैं, जिससे वे आधुनिक तौर पर खेती की पैदावार बढ़ा सके।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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