95 प्रतिशत लोग देर से होते हैं मुधमेह के प्रति सचेत (14 नवम्बर को विश्व मधुमेह दिवस पर विशेष)
नई दिल्ली, 13 नवंबर (आईएएनएस)। भारत विश्व की मधुमेह राजधानी में तब्दील होने जा रहा है। अपनी जीवनशैली के चलते देश में पांच करोड़ से भी अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और इनमें से ज्यादातर को रोग बढ़ जाने के बाद ही इस बीमारी का पता चलता है।
गुड़गांव के 'आर्टीमिस हेल्थ इंस्टीट्यूट'(एएचआई) के चिकित्सकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में पाया गया है कि बहुत पहले ही मधुमेह के स्पष्ट लक्षण विकसित हो जाने के बावजूद करीब 95 प्रतिशत लोगों को रोग बढ़ जाने के बाद ही इस बीमारी का पता चलता है।
चिकित्सकों ने दो साल की अवधि के दौरान सामान्य जांच के लिए आने वाले 300 लोगों के रक्त नमूनों की जांच करने पर पाया कि इनमें से 15 प्रतिशत लोगों में मधुमेह अपनी शुरुआती अवस्था में है।
एएचआई में आंतरिक दवाओं के प्रमुख व अध्ययनकर्ता आशुतोष शुक्ला ने आईएएनएस से कहा, "उनमें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि उनमें भूख, बढ़ने, लगातार प्यास लगने और मूत्र का अधिक निर्माण जैसे मधुमेह के स्पष्ट लक्षण हैं लेकिन इसके बाद भी वे जब तक हालत बिगड़ने न लगे तब तक इसकी जांच नहीं कराते हैं।"
शुक्ला के मुताबिक जागरूकता और रोग की जल्दी पहचान से ही मधुमेह को नियंत्रित किया जा सकता है।
शुक्ला कहते हैं, "जिन लोगों में मोटापा, काम का अधिक तनाव, एक जगह स्थिर रहने वाली जीवनशैली, अच्छा और सही खान-पान न होना और परिवारिक इतिहास में मधुमेह की समस्या होने जैसे खतरे के कारक हों उन लोगों को साल में कम से कम एक बार मधुमेह की जांच कराना चाहिए और जिन लोगों में खतरे के कारक न हों उन्हें दो साल में एक बार यह जांच कराना चाहिए।"
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के प्रोफेसर निखिल टंडन कहते हैं, "मधुमेह लंबे समय तक शहरों या वयस्कों तक ही सीमित नहीं रहेगा।" उन्होंने कहा कि अब गांव में रहने वालों की जीवनशैली में भी बदलाव आ रहा है और उनमें भी मधुमेह की संभावना बढ़ रही है।
पिछले महीने जारी हुई 'इंटरनेशनल डाईबीटिक फेडरेशन' की रिपोर्ट ने चेताया है कि मधुमेह से भारत और अन्य देशों पर आर्थिक भार बहुत बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक 2010 तक भारत मधुमेह नियंत्रण उपायों पर हर साल 2.8 अरब डॉलर खर्च करेगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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