न्यायपालिका की स्वतंत्रता की कीमत पर सूचना नहीं : सर्वोच्च न्यायालय
दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अजीत प्रकाश शाह, न्यायाधीश एस.मुरलीधर और न्यायाधीश विक्रमजीत सेन की खंडपीठ के सामने महान्यायवादी जी.ई.वाहनवती ने कहा, "जनता का जानने का अधिकार अच्छा है लेकिन वहीं यह भी देखा जाना चाहिए कि ऐसे अधिकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं कर रहे हों।"
सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को भी आरटीआई के दायरे में लाने के दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की याचिका पर यह खंडपीठ सुनवाई कर रही है।
वाहनवती ने कहा कि आरटीआई और सूचना दो अलग-अलग चीजें हैं और उन्हें मिलाना नहीं चाहिए।
यह उल्लेख करते हुए कि न्यायाधीशों ने स्वेच्छा से संपत्ति की घोषणा कर दी है, वाहनवती ने कहा, "सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा वर्ष 1997 में स्वीकार किया गया प्रस्ताव गैर संवैधानिक है और न्यायाधीशों पर बाध्यकारी नहीं है।"
खंडपीठ के यह पूछे जाने पर कि प्रस्ताव में न्यायाधीशों के परिवार के सदस्यों को गोपनीयता के अधिकार के तहत अपनी संपत्तियों की घोषणा करना अनिवार्य है या नहीं, वाहनवती ने कहा कि प्रस्ताव इस बारे में स्पष्ट नहीं है।
इस मामले के याचिकाकर्ता एस.सी.अग्रवाल की ओर से उनके वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने निर्णय दिया था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई कानून के दायरे में है। उन्होंने कहा कि संपत्तियों के मूल्यांकन के लिए अधिक परिष्कृत तरीके अपनाए जाने चाहिए और वर्तमान समय के स्थान पर संपत्ति को हासिल करने के समय की कीमत का मूल्यांकन होना चाहिए।
इस मामले पर बहस शुक्रवार को भी जारी रहेगी।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने दो सितम्बर को दिए गए अपने फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी अपील में कहा कि न्यायाधीशों का संपत्ति घोषित करना स्वैच्छिक है और यह आरटीआई कानून के दायरे में नहीं आता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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