भारत में बंद बर्मी विद्रोहियो को राहत

सुबीर भौमिक
बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
भारतीय जेलों में पिछले एक दशक से बंद बर्मा के अराकान प्रांत के 36 अलगाववादी विद्रोहियों को अंततः एक तीसरे देश में जाने की राहत मिल गई है.
विद्रोहियों की वकील के अनुसार इन लोगों को संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संस्था यूएनएचसीआर की निगरानी में किसी तीसरे देश में जाने के लिए सुरक्षित रास्ता दिया जाएगा.
विद्रोहियों के अनुसार उन्हें भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने झाँसा देकर पकड़ लिया था और 1999 में उनके छह नेता अंडमान में मारे भी गए.
मगर भारतीय सेना ने इन लोगों पर हथियारों की अवैध तस्करी का आरोप लगाया और उन्हें पोर्टब्लेयर की एक जेल में बंद कर दिया.
ये 36 बंदी पिछले छह वर्षों से जेल में बंद हैं जबकि उनके ख़िलाफ़ औपचारिक तौर पर कोई भी आरोप दायर नहीं किया गया है.
विद्रोहियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहीं भारत की जानी-मानी मानवाधिकार वकील नंदिता हक्सर ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.
अदालतत ने आदेश दिया कि इन बंदियों को कोलकाता बुलाया जाए ताकि इस मुक़दमे की सुनवाई शीघ्र हो सके.
नंदिता हक्सर ने बीबीसी से कहा,"ये मुक़दमा अब निर्णायक दौर में पहुँच गया है और बर्मा के इन विद्रोहियों के कई बड़े नेता कोलकाता की अदालत में बचाव पक्ष की और से गवाहियाँ दे रहे हैं".
लेकिन नंदिता हक्सर और बर्मी विद्रोहियों के वरिष्ठ नेताओं को इस बात का भय था कि यदि बंदियों को बरी किया जाता है तो भारत सरकार उनको बर्मा को ना सौंप दे.
नंदिता हक्सर ने कहा,"हमारा वो भय अब दूर हो गया है. यूएनएचसीआर ने उनको किसी तीसरे देश में जाने के लिए सुरक्षा देने का भरोसा दे दिया है".
ऐसी स्थिति में अब यदि इन 36 बंदियों को बरी किया जाता है तो वे भारत से बाहर भेजे जा सकते हैं.
चेक गणराज्य और कई अन्य देशों ने इन विद्रोहियों को पहले ही शरण देने की पेशकश की हुई है.


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