परम्परागत सीटों का मिथक तोड़ा उपचुनाव के नतीजों ने
नई दिल्ली, 10 नवंबर (आईएएनएस)। लोकसभा की एक और विधानसभा की 31 सीटों के लिए गत शनिवार को हुए उपचुनाव के नतीजे उन दलों व उनके नेताओं को सचेत करने वाले हैं जो यह मान बैठते हैं कि उनकी सीट तो परम्परागत है और उन्हें हराना उनके प्रतिद्वंद्वियों के लिए आसान नहीं होगा। इन उपचुनावों में आधा दर्जन से अधिक सीटों पर प्रतिद्वंद्वी पार्टियां सेंध लगाने में सफल रहीं।
फिरोजाबाद संसदीय सीट का भी इतिहास कुछ ऐसा ही रहा है। यह समाजवादी पार्टी (सपा) का गढ़ माना जाता रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा के अखिलेश यादव ने ढाई लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की थी। उनसे पहले सपा के वरिष्ठ नेता रामजीलाल सुमन ने 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में यहां से जीत दर्ज की थी।
परम्परागत सीट के मिथक को तोड़ते हुए फिरोजाबाद की जनता ने इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार राज बब्बर के सिर पर जीत का सेहरा बांधा। बब्बर ने सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू डिंपल यादव को 85,000 से अधिक मतों से पराजित किया।
मुलायम का गढ़ कहे जाने वाले इटावा और भरथना विधानसभा उपचुनाव के नतीजे भी कुछ यही कहानी बयान करते हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सपा को उसके गढ़ में ही करारी शिकस्त दी। भरथाना सीट पर जहां बसपा उम्मीदवार शिव प्रसाद यादव ने सपा प्रत्याशी प्रदीप यादव को 16,778 मतों से हराया, वहीं इटावा सीट पर सपा के विमल भदौरिया को 32,827 वोटों से हराकर बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत ने इस सीट पर कब्जा जमाया।
हिमाचल प्रदेश की रोहडू विधानसभा सीट के नतीजे भी यही दर्शाते हैं। यह कांग्रेस की परम्परागत सीट मानी जाती थी। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह यहां से लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके थे। उनके हाथों लगातार चार बार पराजित होने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खुशी राम ने कांग्रेस उम्मीदवार मंजीत सिंह को 8,473 मतों से पराजित किया।
खुशीराम ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "लोगों ने मुझे इसलिए अपना मत दिया क्योंकि लगातार हार के बावजूद मैंने उनसे सतत संपर्क बनाए रखा।"
लखनऊ पश्चिम की सीट भाजपा की परम्परागत सीट मानी जाती थी लेकिन इस बार कांग्रेस उसे पटखनी देने में सफल रही। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन यहां से लगातार जीतते रहे थे। उनके इस्तीफे से यह सीट खाली हुई थी। यहां से पार्टी के उम्मीदवार अमित पुरी को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी आशीर्वाद प्राप्त था लेकिन फिर भी वह हार गए। कांग्रेस के प्रत्याशी श्याम किशोर शुक्ला ने इस सीट पर अपना कब्जा जमाते हुए पुरी को नजदीकी मुकाबले में 2178 मतों से हराया।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश सीटें ऐसी थी जिन्हें वामपंथी दलों की परम्परागत सीट मानी जाती थी लेकिन इन उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस बाजी पलटने में सफल रही।
माक्सवार्दी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को सबसे गहरा झटका कोलकाता के बेलगचिया (पूर्व) सीट पर लगा जहां वह 1977 से जीतती आ रही थी। सुभाष चक्रवर्ती ने यहां से सात बार विजय हासिल की थी। पिछले दिनों उनका निधन हो जाने के बाद पार्टी ने उनकी विधवा रामला को टिकट दिया था। इसके बावजूद यह सीट माकपा की झोली में नहीं आ सकी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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