गैस विवाद में सरकार का कदम बेईमानी भरा : अनिल अंबानी समूह (लीड-1)

इस बारे में सरकार द्वारा दायर याचिका का विरोध करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल शपथ पत्र में अनिल धीरूभाई अंबानी समूह ने कहा है, "रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज इस मामले में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को पक्ष बनाए जाने का विरोध करती है।"

गैस की आपूर्ति और कीमत को लेकर विवाद पर जारी सुनवाई के बीच अदालत में दाखिल शपथ पत्र में कहा गया है, "भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय का कदम बेईमानी भरा और गलत है।"

"यदि सरकार को एक पक्ष बनाया जाता है तो रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज के खोज, निरीक्षण और पुनर्परीक्षण अधिकार को संरक्षित करना पड़ेगा। रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज माननीय अदालत को आश्वस्त करती है कि मामले के निपटारे के दौरान इसे कभी भी बर्बाद नहीं किया जाएगा।"

आंध्र प्रदेश के कृष्णा गोदावरी बेसिन से निकलने वाली गैस में से 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से 2.8 करोड़ यूनिट गैस की आपूर्ति 17 वर्षो तक रिलायंस नेचुरल को करने को लेकर विवाद है।

इस मामले पर पहले बंबई उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई थी, जिसका फैसला रिलायंस नेचुरल के पक्ष में गया था। इसके बाद मुकेश अंबानी की समूह रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

मंगलवार को दाखिल शपथ पत्र के मुताबिक बंबई उच्च न्यायालय में सभी संबंध पक्ष इस बात पर सहमत थे कि तेल मंत्रालय को हस्तक्षेप की अनुमति दी जाएगी, लेकिन केवल उत्पादन बंटवार समझौता से जुड़े मामले में सहयोग के लिए।

शपथ पत्र में तेल मंत्रालय द्वारा उच्च न्यायालय के सामने रखे गए पक्ष को भी शामिल किया गया है। तेल मंत्रालय ने कहा था, "जहां तक दो कंपनियों के बीच विवाद का मामला है तो उसे कुछ नहीं कहना और वह केवल अंतरिम आदेश पर तुरंत निर्णय चाहता है।"

सुनवाई के दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि कृष्णा-गोदावरी बेसिन से गैस निकालने के लिए वह मात्र एक ठेकेदार है और सही मायने में सरकार इसकी मालिक है।

सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से दलीलें पेश करते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि सरकार के साथ उत्पादन के बंटवारे को लेकर हुए समझौते के कई बिंदुओं की व्याख्या के मामले में उसकी भूमिका सीमित है।

प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन, न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और न्यायाधीश ई. सथशिवम की खंडपीठ के समक्ष साल्वे ने कहा कि ठेके के मुताबिक सरकार के पास गैस के बारे में कोई भी फैसला लेने का अधिकार है, इसमें कीमत और खरीददार तय करना भी शामिल है।

उन्होंने कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास न तो पूरी स्वतंत्रता है और न ही उसके पास प्राकृतिक गैस की कीमत तय करने का अधिकार। वह केवल हाइड्रोकार्बन की बिक्री से लाभ कमाने का हकदार है।

साल्वे ने पारिवारिक समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय ऐसा माना गया था कि कीमतों को तय करने में रिलायंस इंडस्ट्रीज को स्वतंत्रता मिलेगी लेकिन इसके बाद सरकार की गैस उपभोग की नीति बदल जाने के कारण खेल के पूरे नियम बदल गए।

शपथ पत्र में रिलायंस नेचुरन ने निम्न बातें भी कही हैं-

- रिलायंस इंडस्ट्रीज ने गलत तरीके से पूंजीगत खर्च को 2.47 अरब डॉलर से बढ़कर 8.8 अरब डॉलर कर दिया जबकि अनुमानित उत्पादन प्रति दिन चार करोड़ यूनिट से केवल दोगुना बढ़ा।

- यदि गैस 2.34 डॉलर प्रति यूनिट के दर से भी बेची जाती है तो रिलायंस इंडस्ट्रीज भारी मुनाफा कमाएगी।

- रिलायंस इंडस्ट्रीज की कोशिश सार्वजनिक कंपनी एनटीपीसी के साथ 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस की आपूति के इसी तरह के समझौते से बाहर निकलने की है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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