भारत ने चीन से कहा, हम धार्मिक नेता के मामले में दखल नहीं देते (लीड-1)
नई दिल्ली/तवांग (अरूणाचल प्रदेश), 9 नवंबर (आईएएनएस)। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की अरूणाचल प्रदेश यात्रा को चीन द्वारा नई दिल्ली के दबाव में की गई यात्रा करार दिए जाने का विरोध करते हुए भारत ने कहा है कि वह किसी धार्मिक नेता के मामलों में दखल नहीं देता। साथ ही उसने यह भी कहा है कि सीमा विवाद के चलते पड़ोसी देश के साथ संघर्ष जैसी कोई स्थिति नहीं है।
इस बीच अरूणाचल प्रदेश के तवांग में दलाई लामा ने सोमवार को 30,000 से अधिक श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए विश्व बंधुत्व और सभी समुदायों के बीच शांति का आह्वान किया। तवांग के पोलो ग्राउंड में तीन दिवसीय धार्मिक प्रवचन के पहले दिन दलाई लामा ने कहा, "दया और शांति दो शब्द हैं, जिनको सभी ने याद रखना चाहिए।"
रविवार को अरूणाचल प्रदेश पहुंचे दलाई लामा ने अपने दौरे के पहले दिन पत्रकारों से दो अलग अलग चर्चाओं में चीन पर हमला बोला था। दलाई लामा ने कहा कि उनकी अरूणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन का विरोध पूरी तरह आधारहीन और इसमें कोई असामान्य बात नहीं है। उन्होंने चीन पर आरोप लगाया कि वह अनावश्यक रूप से उन पर तिब्बत में अलगाववादी आंदोलन को प्रोत्साहन देने के आरोप लगा रहा है।
इससे पहले दलाई लामा ने तवांग में एक अस्पताल का उद्घाटन किया। उन्होंने इसके निर्माण में 20 लाख रुपये का योगदान दिया है।
इस बीच नई दिल्ली में चल रहे भारत आर्थिक शिखर सम्मेलन में विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने कहा है, "दलाई लामा भारत में कहीं भी यात्रा करने के लिए स्वतंत्र हैं..मैंने नहीं सुना कि ऐसा कोई सुझाव हमारी ओर से दिया गया, क्योंकि हम धर्मगुरुओं की धार्मिक यात्राओं के मामलों में दखल नहीं देते। उन्हें अपनी सुविधानुसार अपने लोगों से मिलना था।"
बीजिंग के समाचार पत्र 'ग्लोबल टाइम्स' ने चीन के विश्लेषकों के हवाले से खबर दी है कि इस क्षेत्र में दलाई लामा की यात्रा भारत के दबाव में हुई। चीन इस क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत कहता है।
उधर, लंदन की यात्रा पर गए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का कहना है कि भारत और चीन के बीच भले ही सीमा विवाद हो लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह दोनों देशों में संघर्ष की वजह बन सकता है।
मुखर्जी ने रविवार को पत्रकारों से चर्चा में कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ रहा है और भारतीय सीमा पर विकास कार्यो में तेजी आ रही है।
उन्होंने कहा, "मैं नहीं समझता कि सीमा विवाद दोनों देशों के बीच संघर्ष का कारण बन सकता है। हमारे पास एक संस्थागत व्यवस्था है। यद्यपि इस बारे में दोनों की अलग-अलग राय है लेकिन दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के विशेष प्रतिनिधियों की लगातार बैठकें होती रहती हैं। अभी तक एक दर्जन से अधिक बैठकें हो चुकी हैं।"
उन्होंने कहा, "सैद्धांतिक व राजनीतिक मापदंडों पर कुछ समझौते हुए हैं लेकिन विवाद का वास्तविक समाधान अभी होना बाकी है।"
मुखर्जी ने कहा, "सीमा पार चीन की तरफ हमारे मुकाबले विकास के काम बेहतर हो रहे हैं लेकिन अब हमने भी इस दिशा में काम आरंभ कर दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीमा क्षेत्रों (पश्चिमी और पूर्वी ) के विकास के लिए पैकेज की घोषणा की है।"
उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर विवाद है लेकिन पिछले महीने थाइलैंड में हुई दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के बीच दो बुनियादी सिद्धांतों पर सहमति बनी थी।
उन्होंने कहा, "दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच सीमा पर शांति व सद्भाव बनाए रखने और आर्थिक सहयोग संबंधी दो बुनियादी सिद्धांतों पर सहमति बनी थी ।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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