बंदूक के साए में विकास संभव नहीं: मनमोहन सिंह

बंदूक के साए में विकास संभव नहीं: मनमोहन सिंह

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत की जनजातियों के बारे में कहा है कि 'दशकों से अलग-थलग पड़े लोगों की स्थिति अब एक ख़तरनाक मोड़ ले रही है और दिलों की जंग जीतने ज़रूरत है.'

देश के मुख्यमंत्रियों और जनजातियों के मामलों के मंत्रियों की बैठक को दिल्ली में संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये भी कहा है कि 'बंदूक के साए में दीर्घकालिक विकास संभव नहीं है.'

उन्होंने कहा, "दशकों से अलग-थलग पड़े लोगों की स्थिति अब एक ख़तरनाक मोड़ ले रही है. हम जिस तरह से जनजातियों के लोगों के साथ बर्ताव कर रहे थे उसमें बदलाव लाने की ज़रूरत है. हमें दिलों की जंग जीतनी है. हम ये नहीं कह सकते कि हमने अतीत में इन मुद्दों का निवारण बहुत संवेदनशीलता के साथ किया है....और बहुत कुछ किया जा सकता था और बहुत कुछ किया जाना चाहिए."

'ताज़ा शुरुआत'

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना था, "बंदूक के साए में कोई दीर्घकालिक विकास संभव नहीं है. जनजातियों के लोगों के पक्ष में बात करने वाले जो दावे करते हैं, उन्होंने ने भी आर्थिक विकास का कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं सुझाया है.....हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती और इस ख़तरे का दृढ़ता से सामना किया जाएगा."

उनका कहना था, "हमें ताज़ा शुरुआत करने की ज़रूरत है...केवल भूमि के कारण हो रहा विस्थापन ही मुद्दा नहीं है. इन समुदायों को जिन जंगलों ने सदियों से पाला है, उन्हीं जंगलों को काटने से इनके सदस्यों पर हो रहे मनोवैज्ञानिक असर की केवल कल्पना ही की जा सकती है."

उनका कहना था कि विस्थापन के बाद पुनर्वास से पैदा होने वाला गंभीर सवाल केवल मुआवज़े का नहीं है बल्कि आजीविका, पारंपरिक सामुदायिक भावना और जनजातियों के लोगों को उनके अलग-थलग पड़ने की भावना में मदद के हैं.

मनमोहन सिंह का कहना था कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश ने हाल में क़बायलियों के ख़िलाफ़ दर्ज मामले वापस लिए हैं और अन्य राज्यों को भी तत्काल ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए.

उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने 'सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दो बार वन अधिकार संबंधित क़ानून साल के अंत तक लागू किए जाने पर लिखा था और जहाँ कुछ राज्यों में इस दिशा में काफ़ी प्रगति की है, वहीं अन्य राज्य काफ़ी पीछे हैं.'

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