जनजातीय लोगों ने अपने अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन किया
विरोध प्रदर्शन आयोजित करने वाले 'अस्तित्व और गरिमा' (सरवाइवल एंड डिगनिटी) अभियान के शंकर गोपालकृष्णन ने कहा, "केंद्र सरकार का दावा है कि उसे जनजातियों और वनवासियों के अधिकारों की परवाह है और वह उनका विकास चाहती है। पर वह ऐसी पहलों को बढ़ावा देती है जिनसे यह समुदाय अपने अधिकारों से वंचित हो सकता है।"
उन्होंने कहा, "जनजातीय समुदाय के करीब 200 सदस्य अपनी कुछ मांगों के साथ यहां विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए हैं और इस संबंध में हमने प्रधानमंत्री को भी लिखा है। इन मांगों में वन अधिकार अधिनियम के तहत जनजातियों को अपने वन संसाधनों की रक्षा के अधिकार और शक्ति को मान्यता दिए जाने की मांग शामिल है।"
गोपालकृष्णन ने कहा कि वन क्षेत्र की सभी कार्पोरेट परियोजनाओं में जनजातीय समुदाय की सहमति अवश्य ली जाए।
बुधवार को राजधानी में आयोजित मुख्यमंत्रियों एवं जनजातीय मामलों के मंत्रियों के सम्मेलन के समानांतर ही वन अधिकार अधिनियम के लागू न होने के विरोध में मंगलवार से विरोध प्रदर्शन शुरू किया गया है।
सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आधुनिक आर्थिक प्रक्रियाओं में जनजातीय लोगों को हिस्सेदार बनाने में व्यवस्था की विफलता और उनकी बसाहट वाले इलाकों में निर्दय घुसपैठ की बात स्वीकार करते हुए जनजातियों तक विकास के लाभ पहुंचाने पर जोर देने को कहा है।
दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि दशकों से जारी अलगाव ने देश के कुछ हिस्सों में खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था में जनजातीय समुदायों का शोषण तथा सामाजिक, आर्थिकभेदभाव लंबे समय तक सहन नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी सच है कि बंदूकों के सहारे इसका कोई स्थाई हल संभव नहीं है, न ही जनजातियों के हितों के लिए बोलने का दावा करने वालों ने कोई वैकल्पिक आर्थिक या सामाजिक रास्ता सुझाया है, जो व्यवहार्य हो। हिंसा के रास्ते से केवल आम आदमी की तकलीफें ही बढ़ेंगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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