रिलायंस गैस विवाद से अलग हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (लीड-1)

न्यायाधीश रविंद्रन की बेटी बेंगलुरू स्थिति एक कंपनी एबीजे पार्टनर्स में काम करती है। एबीजे पार्टनर्स मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज को वैश्विक स्तर पर अधिग्रहण के मामलों में कानूनी सलाह देती है। इस तथ्य के खुलासे के बाद रविंद्रन ने बुधवार को स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया।

न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें सप्ताहांत में अपनी बेटी की कंपनी के रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ संबंधों के बारे में पता चला। प्रधान न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन और न्यायाधीश पी. सतशिवम के साथ रविंद्रन इस चर्चित कानूनी विवाद की सुनवाई कर रहे थे।

उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि मेरी आत्मा साफ है। लेकिन न्याय केवल होता नहीं बल्कि इस संस्था की मर्यादा और इसके प्रति सम्मान के लिए यह दिखना भी चाहिए कि न्याय हो रहा है।" उन्होंने कहा, "काश मेरी जानकारी में इसे कोई पहले लाया होता तो मैं उसका अभारी होता।"

उन्होंने मामले से अलग होने की जानकारी उस वक्त दी जब रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से वकील हरीश साल्वे अपनी दलील पूरी करने वाले थे। अब इस मामले पर गुरुवार से एक नई तीन सदस्यीय खंठपीठ नए सिरे से सुनवाई करेगी।

रविंद्रन के खुलासे के तुरंत बाद अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस नेचुरल र्सिोसेज के वकील राम जेठमलानी ने उनसे सुनवाई जारी रखने की अपील की, लेकिन रिलायंस इंडस्ट्रीज के वकील ने चुप्पी साधे रखी।

खंडपीठ के दो और सदस्यों ने भी कहा कि जब एक बार यह फैसला ले लिया गया है कि मामले की जटिलता को देखते हुए इस पर तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा सुनवाई की जाएगी तो ऐसे में दो न्यायाधीशों द्वारा निर्णय लेना संभव नहीं है।

इसके बाद प्रधान न्यायाधीश बालाकृष्णन नई तारीख के लिए कैलेंडर देखने लगे लेकिन साल्वे ने कहा कि वह 30 नवंबर से नौ दिसंबर के बीच उपलब्ध नहीं होंगे।

इस पर प्रधान न्यायाधीश ने आश्चर्य जताया कि यदि सुनवाई जनवरी तक खिंचती है तो! इस पर जेठमलानी ने सुझाव दिया कि साल्वे को समायोजित करने के लिए सुनवाई गुरुवार से एक सप्ताह के लिए जारी रह सकती है, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

अब तक की सुनवाई के दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज के वकील की दलील पर न्यायाधीश रविंद्रन कई सवाल पूछते रहे और अपनी प्रतिक्रिया देते रहे।

उन्होंने 29 अक्टूबर को एक टिप्पणी की थी कि कृष्णा-गोदावरी से निकलने वाली गैस को यदि सस्ती दर पर बेचा जाए तो पूरे देश को लाभ होगा जबकि अधिक कीमत पर बेचने से केवल रिलायंस इंडस्ट्रीज को लाभ मिलेगा।

न्यायाधीश रविंद्रन ने रिलायंस इंडस्ट्रीज से एक बार यह भी पूछा था कि वह 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से रिलायंस नेचुरल को गैस की आपूर्ति क्यों नहीं कर सकती जबकि उसे इस कीमत पर भी लाभ हो रहा है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज और रिलायंस नेचुरल के बीच 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से 17 वर्षो तक गैस की आपूर्ति के मुद्दे पर विवाद है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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