जनजातियों के अलगाव ने खतरनाक रूप लिया : प्रधानमंत्री (लीड-2)

राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा वन और जनजातीय विकास मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री ने बेबाकी से कहा कि दशकों से जारी इस अलगाव ने देश के कुछ हिस्सों में खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया है।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदायों का शोषण तथा सामाजिक, आर्थिकभेदभाव लंबे समय तक सहन नहीं किया जा सकता है। "परंतु यह भी सच है कि बंदूकों के सहारे इसका कोई स्थाई हल संभव नहीं है, न ही जनजातियों के हितों के लिए बोलने का दावा करने वालों ने कोई वैकल्पिक आर्थिक या सामाजिक रास्ता सुझाया है,जो व्यवहार्य हो। हिंसा के रास्ते से केवल आम आदमी की तकलीफें ही बढ़ेंगी।"

प्रधानमंत्री ने कहा, "हम इस खतरे को समाप्त करेंगे। जहां एक ओर हिंसा सहन नहीं की जा सकती, वहीं जनजातियों को विकास प्रक्रिया के फायदों में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हम उनके दिलों की लड़ाई जीतेंगे।"

प्रधानमंत्री की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के वनवासी समुदायों के लोग वन अधिकार कानून को लागू नहीं किए जाने और अधिकारियों का दमन जारी रहने का विरोध करने के लिए राजधानी में एकत्र हुए हैं।

कुछ राज्यों में वन अधिकार कानून,2009 के तहत मालिकाना हक के वितरण में ढिलाई की आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री ने इस प्रक्रिया को तेज करने का आग्रह किया, जिससे वह तय समय पर पूरी हो सके।

उन्होंने कहा कि मालिकाना हकों का वितरण वनों और वनवासियों के सहजीवी संबंधों को मान्यता देने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम है।

प्रधानमंत्री ने जनजातियों की बसावट वाले इलाकों में निर्दय घुसपैठ की बात स्वीकार करते हुए जनजातियों तक विकास के लाभ पहुंचाने पर जोर देने को कहा।

विकास प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों को शामिल करने पर जोर देते हुए सिंह ने राज्य सरकारों से व्यवस्था की वजह से शोषण के शिकार लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने का आग्रह किया।

सिंह ने कहा, "राज्यों को जनजातीय समुदायों के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास करना चाहिए। विकास प्रक्रिया से उनको जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है। परंतु यह शोषण का एक साधन नहीं बनना चाहिए न ही यह उनकी विशिष्ट पहचान या संस्कृति की कीमत पर होना चाहिए।"

सम्मेलन का आयोजन वन अधिकार कानून और जनजातीय विकास और कल्याण कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए किया गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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