कनाडा में आज भी हैं कुछ खालिस्तान समर्थक
1980 के दशक में अलग सिख राज्य की मांग को लेकर चले खालिस्तान आंदोलन से भारत के बाहर कनाडा भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था।
सिख आतंकवादी अलग खालिस्तान के लक्ष्य को पूरा करने के लिए खुले तौर पर हिंसा में लिप्त थे।
यद्यपि सुनवाई अदालत ने यहां किसी को भी आरोपी नहीं बनाया है पर सिख आतंकवादियों ने जून 1985 में एयर इंडिया की कनिष्क उड़ान में बम विस्फोट किया था जिसमें 329 यात्री मारे गए थे। आतंकवादियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की भी साजिश रची थी।
साल गुजरने के साथ इस आंदोलन के पूर्व कट्टरपंथियों ने महसूस किया कि उनके द्वारा अपनाए गए तरीके तुच्छ थे। कनाडा से दूर स्थित भारत में नई पीढ़ी की बहुत थोड़ी रुचि है।
कंजरवेटिव पार्टी की वर्तमान कनाडाई सरकार ने आतंकवादी संगठन 'बब्बर खालसा' पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।
अपनी मांग पर अड़े रहने वाले कुछ मुट्ठीभर खालिस्तान समर्थक अमूमन हर अवसर पर भारत-विरोधी नारे लगाने की कोशिश करते हैं। फिर चाहे वह भारत का स्वतंत्रता दिवस हो या कोई ऐसा कार्यक्रम जिसमें भारतीय कूटनीतिज्ञ शामिल हों या वेंकुवर के बाहरी इलाके में स्थित पंजाबी बहुल सूरे शहर में सिख परेड का आयोजन हो।
कट्टरपंथियों का विरोध करने वालों में भारतीय मूल के चोटी के कनाडाई नेता उज्जल दोसांझ शामिल हैं। जिन्हें इस विरोध की भारी कीमत भी चुकाना पड़ी।
अलगाववादियों ने 1980 में दोसांझ के खालिस्तान का विरोध करने के लिए उन्हें बुरी तरह पीटा था और उन्हें 'सिखों के तालिबान' की संज्ञा दी थी।
कुछ समय पहले दोसांझ ने आईएएनएस से कहा था कि ये लोग अपनी मांग को उचित बताने के लिए लोगों को आकर्षित करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
कुछ कनाडाई राजनीतिक दल भी सिख मतदाताओं से मिलने वाले वोटों की खातिर इस मांग को भुनाने की कोशिश करते हैं।
टोरंटो के सिख नेता नक्षत्र सिंह चौहान ने आईएएनएस से कहा, "इसमें जरा भी संशय नहीं है कि कुछ राजनीतिक दलों के नेता वोटों के लिए इन तत्वों का समर्थन करते हैं। ये नेता खालिस्तानियों को उत्साहित करने के जिम्मेदार हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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