बटला हाउस गोलीकांड की न्यायिक जांच से इंकार (लीड-1)
प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति पी. सथशिवम व न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान की खंडपीठ ने यह कहते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया कि पुलिस पर फायरिंग करने वाले सशस्त्र युवक निर्दोष नहीं हो सकते।
गैर सरकारी संगठन 'ऐक्ट नाउ फॉर हारमनी एंड डेमोक्रेसी' (अनहद) की ओर से दायर इस याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें इस मामले में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दे दी गई थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की एक रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए दिल्ली पुलिस को इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यह कहते हुए मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की कि एनएचआरसी की रिपोर्ट सिर्फ पुलिस के बयान पर आधारित है। लेकिन खंडपीठ ने उनकी दलील खारिज कर दी और कहा, "आप क्या समझते हैं? क्या पुलिस अधिकारी को किसी अन्य स्थान से मार कर वहां लाया गया था।"
इस पर प्रशांत भूषण ने मुठभेड़ के बाद समाज के एक बड़े तबके में इस मामले में पुलिस की भूमिका को लेकर उभरे संदेह, असंतोष और अविश्वास का जिक्र किया। इस पर खंडपीठ ने कहा, "यही तो समस्या है। अपराधी तो अपराधी होते हैं। उन्हें समाज के किसी वर्ग के रूप में मत पहचानिए।"
खंडपीठ ने कहा, "देश में आतंकियों और अपराधियों के साथ मुठभेड़ में हजारों पुलिस कर्मी मारे जा रहे हैं।" उन सब घटनाओं की जांच से उनका अनावश्यक उत्पीड़न ही होगा।
गौरतलब है कि 19 सितम्बर, 2008 को बटला हाउस में हुई मुठभेड़ में इंडियन मुजाहिदीन के दो संदिग्ध आतंकवादी मारे गए थे। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के निरीक्षक मोहन चंद शर्मा भी शहीद हो गए थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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