वह लम्हा, जब भारत दहल उठा! (31 अक्टूबर पर विशेष)

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (आईएएनएस)। वह ऐसा लम्हा था, जिससे भारत दहल उठा और विश्व स्तब्ध रह गया! 25 साल पहले, उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन, बुधवार सुबह, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब तेजी से कदम बढ़ाती हुईं अपने आवास और कार्यालय को विभाजित करने वाले पिकेट गेट की ओर बढ़ रही थीं कि तभी अचानक उनके दो सिख अंगरक्षकों ने उन पर ताबड़-तोड़ गोलियां बरसाईं और वह लहूलुहान होकर गिर पड़ीं।

उनकी पुत्रवधू सोनिया गांधी, जो अभी तक नाइटड्रेस में ही थीं और इंदिरा के अतिरिक्त निजी सचिव एवं वर्षो तक उनकी परछाईं की तरह उनके साथ रहने वाले आर.के.धवन 66 वर्षीय इंदिरा को सहारा देने के लिए उनकी ओर लपके।

इकत्तीस गोलियों से छलनी हो चुकी उनकी क्षीण काया के जीवित बचने की आस कम ही थी। उन्हें एक एंबेस्डर कार में सोनिया की गोद में लिटाकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ले जाया गया। जहां ऑपरेशन थिएटर में मौजूद चिकित्सक यह जानते थे कि यह ऐसी जंग है, जिसमें उनकी फतह मुमकिन नहीं।

उन्हें वहां तक लेकर जाने वाले एक पुलिस अधिकारी का कहना था कि वे पहले ही दम तोड़ चुकी थीं। आधिकारिक तौर पर उनकी मौत की घोषणा कई घंटे बाद की गई, क्योंकि भारत सरकार उस महिला को खो बैठने की हकीकत स्वीकार करने की कोशिश कर रही थी जिन्होंने 15 साल तक देश की बागडोर संभाली थी।

उनका कुल कार्यकाल अपने पिता एवं देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से दो साल कम रहा। नेहरू लगातार 17 साल तक प्रधानमंत्री पद पर रहे थे।

इंदिरा, हमले के समय, ब्रिटिश पटकथा लेखक एवं अभिनेता पीटर उस्तिनोव को साक्षात्कार देने जा रही थीं, जो उस समय एक अकबर रोड के उद्यान में अपने साथियों के साथ प्रधानमंत्री की प्रतीक्षा कर रहे थे।

मुलाकात का वक्त सुबह 9.30 बजे था। पर 31 अक्टूबर 1984 की सुबह की नीरवता गोलियों की आवाज ने भंग कर दी। परिन्दों के झुंड आसमान में मंडराने लगे। इधर गोलियों की गूंज की प्रतिध्वनि दिल्ली के हरेभरे और शांत लुटियन्स जोन और अन्य जगहों पर गूंज रही थी।

दोनों अंगरक्षकों-बेअंत सिंह और सतवंत सिंह- ने अपनी मैग्जीनें इंदिरा को निशाना बनाकर खाली कर दीं और फिर समर्पण कर दिया। उन दोनों को गार्डहाउस ले जाया गया, जहां बच कर भागने की कोशिश कर रहे बेअंत सिंह को अन्य सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया। पांच साल बाद 1989 में सतवंत सिंह को फांसी दे दी गई।

इंदिरा गांधी की हत्या प्रत्यक्ष तौर पर- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मौजूद भारी मात्रा में हथियारों से लैस सिख उग्रवादियों का मुकाबला करने के लिए जून 1984 में हुई सैन्य कार्रवाई का प्रतिशोध थी।

उनकी मौत से राजधानी में राजनीतिक शून्य की स्थिति की उत्पन्न हो गई। उनके उत्तराधिकारी समझे जाने वाले बड़े पुत्र राजीव गांधी उस समय कोलकाता में थे। उनकी कैबिनेट के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य प्रणब मुखर्जी भी वहीं थे। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह यमन की यात्रा पर थे। हर कोई उन हालात से निपटने के लिए राजधानी की ओर लपका, जिसके लिए उनमें से कोई भी तैयार न था।

राजीव गांधी को इस शून्य को भरने और उस रात देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए पहले उनके रिश्ते के भाई अरुण नेहरू और फिर ज्ञानी जैल सिंह ने समझा-बुझाकर राजी किया।

लेकिन तब तक एम्स के आसपास हिंसा भड़क उठी थी और ऐसी खबरें थीं कि उग्रवादी सिख संगठनों द्वारा उनकी मौत की सराहना किए जाने की प्रतिक्रिया में सिखों को निशाना बनाया जा रहा है।

पहली नवंबर की सुबह उनका पार्थिव शरीर तोपगाड़ी में रखकर दिल्ली की वीरान सड़कों से गुजरते हुए उनके पिता के विशाल आवास और नेहरू संग्रहालय स्थल तीन मूर्ति रोड भवन पर लाया गया। उनके पार्थिव शरीर के पास समर्थकों और विरोधियों की लंबी कतारंे थीं, और विश्व ऐसे नेता के निधन पर शोकाकुल था जिन्हें न पसंद करने वालों की कमी थी, न ही नापसंद करने वालों की।

हत्या के कुछ घंटों बाद शहर पर अंधकार की छाया मंडराते ही दंगे भड़क उठे। कथित तौर पर कांग्रेसी नेताओं की अगुवाई में संगठित भीड़ ने सिखों पर चुन-चुनकर हमला किया, उनकी संपत्ति लूटी, मकानों को आग लगा दी। कत्लेआम का एक ऐसा दौर शुरू हो गया जो 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद से किसी ने न देखा था।

अगले तीन दिन तक, इधर देश शोक में डूबा हुआ था, उधर दिल्ली सिख विरोधी हिंसा की आग में जल रही थी, यह आग कानपुर, मेरठ और रामगढ़ की ओर फैल रही थी जहां सिख रेजीमेंटल सेंटर था।

कामकाजी वर्ग वाले इलाके त्रिलोकपुरी, तिलक नगर, सीमापुरी, जहां लोग मेलजोल से रहते आए थे, रातोंरात नफरत के स्मारक बन गए। पड़ोस के सभी सिख परिवारों के घर फूंक दिए गए। सिख पुरुषों को जबरन घसीटकर घरों से बाहर निकालकर जिंदा जला दिया गया और इधर बदले की आग में जलती भीड़ अट्टहास करती रही।

दक्षिणी दिल्ली के अभिजात्य इलाकों में भी सिखों को बख्शा नहीं गया और उनके मकान जला दिए गए। शहर से भागने की कोशिश कर रहे कुछ सिखों को बसों और ट्रेनों में से खींच कर निकाल लिया गया।

तीन दिन तक यह पागलपन बदस्तूर जारी रहा और उसके बाद तीन नवंबर शाम को स्तब्ध और निशक्त हो चुके प्रशासन ने मदद के लिए सेना को तलब किया। उस समय तक कम से कम 3000 सिख मारे जा चुके थे, हजारों घायल हो गए थे और हिंसा का शिकार हुए थे और पूरा समुदाय इस कदर सहम गया कि एक पीढ़ी बाद भी उसके जख्म आज भी हरे हैं।

कुछ दिन बाद राजीव गांधी ने अपनी माता की याद में आयोजित एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए इस हिंसा के संदर्भ में कहा, "जब कोई बड़ा दरख्त गिरता है, तो धरती हिलती है।"

इंदिरा गांधी की मौत की चौथाई सदी बाद, इंदिरा की विरासत कायम है।

इटली में जन्मी उनकी पुत्रवधू सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान थाम रखी है और अक्सर उनके अंदाज और पार्टी पर पकड़ के लिए उनकी तुलना इंदिरा से होती है।

देश की वित्तीय नीतियों और सार्वजनिक उद्यमों पर सरकार के नियंत्रण की अग्रदूत बनीं बैंकों के राष्ट्रीयकरण की इंदिरा की नीति को उनकी दूरदर्शिता के रूप में सराहा जाता है। यह नीति भारतीय बैंकों को उन पश्चिमी बैंकों की राह पर चलने से रोकने में कारगर सिद्ध हुईं, जो पिछले साल की आर्थिक मंदी में मुंह के बल जा गिरे।

उनकी सशक्त विदेश नीति, जो पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश के जन्म का सबब बनी, आज भी भारत की ताकत की मिसाल समझी जाती है जिसके बारे में आलोचकों का कहना है कि उस ठोस कार्रवाई का अनुसरण बाद की सरकारों ने किया।

लेकिन जैसा उनके आलोचकों का कहना है, इंदिरा द्वारा जून 1975 में की गई आपातस्थिति की घोषणा उनकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को कलुषित कर गई, हालांकि उन्होंने 19 महीने बाद आपात स्थिति हटाकर देश में चुनाव कराए, जिनमें उनकी हार हुई। पर इस प्रकरण से उनकी छवि को ऐसा धक्का पहुंचा जिसकी छाया से वह कभी नहीं उबर सकीं।

वह 1980 में सत्ता में लौटी। उसी साल जून में उनके छोटे पुत्र संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो गई। वह अपनी खुद का क्षीण प्रतिबिंब बनकर रह गईं थी।

इसके बाद 1983 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शिखर बैठक और राष्ट्रमंडल देशों की शिखर बैठक का आयोजन कर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय राजनेता की अपनी छवि को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया। बाद के वर्षो में, सिखों का वेटिकन समझे जाने वाले स्वर्ण मंदिर में सेना को दाखिल होने का आदेश देकर वह एक ऐसी गंभीर चूक कर बैठीं जिसकी कीमत चार महीने बाद उन्हें प्राणों की आहूति देकर चुकानी पड़ी।

ोइंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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