भाभा ने देखा था परमाणु संपन्न भारत का सपना (जन्म शताब्दी पर विशेष )
देश में विज्ञान जगत की इस महान विभूति का शुक्रवार को 100वां जन्म दिवस है। मुंबई में 30 अक्टूबर, 1909 को जहांगीर होरमुसजी भाभा और महरबाई के यहां पैदा हुए भाभा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। विज्ञान के अन्वेषणों और परिकल्पनाओं से अलहदा उनमें संगीत, किताबों और अपनी संस्कृति के प्रति ललक थी।
वर्ष 1924 में होमी भाभा ने महज 15 वर्ष की उम्र में 'सीनियर कैंब्रिज' की परीक्षा पास की। कैंब्रिज में उनका प्रदार्पण ही भौतिकी की क्षेत्र में उनके सुनहरे अध्याय की शुरुआत थी। 1934 में उन्होंने भौतिक विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की और उस समय उनकी उम्र 25 वर्ष थी।
लंदन में रहते हुए भाभा ने भौतिकी क्षेत्र के कई बड़े नामों मसलन, नेल्स बोर, जेम्स फ्रैंक और एनरिको फर्मी से मुलाकात की। महान वैज्ञानिक डब्ल्यू. जे. लेविस भी उनके मित्र थे।
भाभा वर्ष 1940 में स्वदेश लौटे तो फिर वह वापस विदेशी सरजमीं की ओर नहीं मुड़े। उसी समय उन्होंने उद्योगपति दोराब जे. टाटा को लिखा, "एक बार परमाणु ऊर्जा का उपयोग बिजली के उत्पादन में होने लगेगा तो हमें विदेशी शक्तियों की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
इसके बाद ही 19 दिसंबर, 1945 को 'टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च' (टीआईएफआर) की नींव पड़ी। भाभा इस संस्थान के पहले निदेशक बने। 24 जनवरी, 1966 में एक विमान हादसे में मौत के आगोश में सोने से पहले उन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण काम किए।
पत्रकार राज चेंगप्पा की पुस्तक 'वेपंस ऑफ पीस: द सीक्रेट स्टोरी ऑफ इंडियाज क्वे स्ट टू बी ए न्यूक्लियर पावर' में कहा गया है कि भाभा ने परमाणु वैज्ञानिक राजा रामन्ना से कहा था, "हमें परमाणु क्षमता रखनी चाहिए। पहले हमें खुद को साबित करना चाहिए, उसके बाद अहिंसा और परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व के बारे में बात करनी चाहिए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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