गैस आपूति समझौते के लिए मापदंड होने चाहिए : सर्वोच्च न्यायालय
सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद पर चौथे दिन जारी सुनवाई के दौरान कहा, "गैस की आपूर्ति के लिए किसी उचित समझौते पर पहुंचने के लिए मापदंड अवश्य होने चाहिए।"
प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति आर.वी.रवींद्रन और न्यायमूर्ति पी.सथशिवम की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा, "या तो आप आपस में समझौता कर लें या हम समझौता करने का निर्देश दे सकते हैं।"
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब रिलायंस इंडस्ट्रीज के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने बहस के दौरान कहा कि अंबानी परिवार के पुनर्गठन समझौते से उनके मुवक्किल का कुछ भी लेना-देना नहीं है।
साल्वे ने कहा, "जो बात बोर्ड या शेयरधारकों द्वारा मंजूर नहीं की गई है वह योजना का हिस्सा नहीं है। बोर्ड का फैसला अंतिम होता है। उससे आगे बढ़ने का कोई मौका नहीं होता।"
साल्वे ने कहा, "रिलायंस इंडस्ट्रीज बोर्ड को निजी समझौते के बारे में कोई जानकारी नहीं है।"
साल्वे के अनुसार एक बेहतर और ज्यादा उपयुक्त व्यवस्था फिलहाल सरकार द्वारा तैयार की गई गैस उपयोग नीति है। "लेकिन इस नीति के अनुसार रिलायंस इंडस्ट्रीज न तो कीमत निर्धारित करने को स्वतंत्र है और न ग्राहक चुनने के लिए ही।"
इस पर रिलायंस नेचुरल की ओर से हस्तक्षेप करते हुए अधिवक्ता राम जेठमलानी ने कहा कि उनका मुवक्किल सरकार की गैस उपयोग नीति के खिलाफ नहीं है, लेकिन इसे पश्चगामी तरीके से नहीं बल्कि अग्रगामी तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
जेठमलानी ने कहा, "इससे वर्तमान समझौता प्रभावित नहीं होना चाहिए।" जेठमलानी ने कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से गैस बेचने पर भी हजारों करोड़ रुपये कमाएगी।
यह विवाद कृष्णा गोदावरी बेसिन से निकलने वाले गैसे की आपूर्ति से जुड़ा है। गैस के खोज का ठेका रिलायंस इंड्रस्ट्रीज को वर्ष 2005 में मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी में बंटवारे से पूर्व मिली थी।
परिवार पुनर्गठन समझौता के मुताबिक अनिल अंबानी ग्रुप 17 वर्षो तक प्रतिदिन 2.8 करोड़ यूनिट गैस 2.34 डॉलर के दर से चाहती है जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज का कहना है कि वह 4.20 डॉलर प्रति यूनिट के दर से गैस बेच सकती है। उसका दावा है कि यह दर सरकार ने तय किया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


Click it and Unblock the Notifications