सेना के आगमन दिवस का कश्मीर घाटी में विरोध, बंद का आह्वान (लीड-1)
पाकिस्तानी घुसपैठियों के साथ हुई लड़ाई में मारे गए सैनिकों और अधिकारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए सेना ने पूरे जम्मू-कश्मीर में समारोहों का आयोजन किया था।
अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी के बंद के आह्वान के असर से घाटी की दुकानें बंद रही और कार्यालयों में कम उपस्थिति दर्ज हुई।
श्रीनगर की सड़कों से बसें और यातायात के अन्य साधन नदारद थे और इक्का-दुक्का निजी वाहन ही दिखाई दे रहे थे। यद्यपि, गलियों में पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ)के जवान गश्त लगा रहे थे।
राज्य सरकार के कार्यालयों, शैक्षिक संस्थानों और बैंकों में कुछ लोग ही काम पर पहुंचे। घाटी के अन्य शहरों में भी ऐसी ही स्थिति रही।
1947 में पाकिस्तान प्रेरित कबायली हमले को रोकने के लिए सेना के कश्मीर पहुंचने वाले दिन को आज सेना ने 'जम्मू एवं कश्मीर बचाओ दिवस' के रूप में मनाया।
1947 में आज ही के दिन स्वतंत्र भारत की सेना ने पहली बार जम्मू-कश्मीर घाटी में अपनी कार्रवाई की थी। जब श्रीनगर के बाहरी इलाके शालटेंग में पाकिस्तानी घुसपैठिए पहुंच रहे थे उसी समय सिख रेजीमेंट की पहली टुकड़ी श्रीनगर हवाईअड्डे पर उतरी थी।
1947 के उस दिन की याद में आज यहां आयोजित सैन्य कार्यक्रमों का नेतृत्व सेना की उत्तरी कमान प्रमुख लेफ्टीनेंट जर्नल बी. एस. जैसवाल ने किया।
जम्मू से 66 किलोमीटर दूर स्थित ऊधमपुर में सेना की उत्तरी कमान के मुख्यालय में आयोजित एक समारोह में शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए जर्नल जैसवाल ने जम्मू-कश्मीर में चल रहे छद्म युद्ध को समाप्त करने के सेना के संकल्प को दोहराया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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