क्रायोजेनिक इंजन निर्माता देशों में शुमार होगा भारत
चेन्नई, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। अपने प्रथम चंद्रयान अभियान के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को आगामी दिसंबर में भारत को उन विशिष्ट देशों की कतार में शामिल कर मील का एक और पत्थर स्थापित करने की उम्मीद है, जिन्होंने अपने क्रायोजनिक इंजन विकसित किए हैं।
इसरो को उम्मीद है कि स्वदेशी तकनीक से विकसित भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) के जरिए प्रयोग के तौर पर जीएसएटी-4 नाम के उपग्रह को दिसंबर के मध्य में रवाना किया जाएगा। इसरो का यह वर्ष 2009 का आखिरी अभियान होगा।
जीएसएलवी-डी3 में पूरी तरह भारत में निर्मित क्रायोजेनिक इंजन लगाया जाएगा। इसे पहली बार रॉकेट के ऊपरी हिस्से में लगाया जाएगा। जीएसएलवी-डी3 को चेन्नई के करीब श्रीहरिकोटा में स्थित इसरो के उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से रवाना किया जाएगा।
जीएसएलवी-डी3 अपने साथ जीएसएटी-4 नाम का संचार उपग्रह लेकर जाएगा, जिसे पृथ्वी से 36,000 किलोमीटर ऊपर भू-स्थैतिक कक्षा में स्थापित किया जाएगा। 49 मीटर ऊंचे इस रॉकेट में 414 टन भार वहन करने की क्षमता है।
अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन को ही अपने क्रायोजनिक विकसित करने में कामयाबी मिली है और भारत को भी इनकी कतार में शामिल होने की उम्मीद है।
इससे पहले पांचों जीएसएलवी मिशनों में इसरो ने रूस में निर्मित क्रायोजेनिक इंजनों का उपयोग किया था।
सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के सहायक निदेशक एम. वी. एस. प्रसाद ने बताया, "क्रायोजनिक इंजन इस महीने के आरंभ में तमिलनाडु के महेंद्रगिरी में इसरो की इकाई से श्रीहरिकोटा पहुंच चुका है। जीएसएटी4 संचार उपग्रह के अगले महीने के मध्य में यहां पहुंचने की उम्मीद है। अंतिम परीक्षण बेंगलुरू में होंगे जहां इसका निर्माण किया गया है।"
प्रसाद के अनुसार इसरो हर साल छह रॉकेट प्रक्षेपित करने की तैयारी कर रहा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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