84' के दंगों की मार से आज भी कराह रही है सिखों की नई पीढ़ी

नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (आईएएनएस)। वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में अमनदीप कौर के परिवार के सभी पुरूष सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। उस वक्त वह महज एक साल की थी लेकिन आज वह खुद एक बच्चे की मां है।

अमनदीप की तरह कई ऐसे सिख युवक-युवतियां हैं, जो या तो उस समय शैशवास्था में थे या जिनका उस समय जन्म भी नहीं हुआ था, वे सब अपने परिजनों के साथ हुई उन भयावह घटनाओं के अहसास को भूल नहीं पाए हैं, जिनके चलते उन्हें घर व परिवार और साथ ही साथ शिक्षा तक से महरूम होना पड़ा। उनका बचपन हर तरह से अभाव में बीता।

अमनदीप कहती हैं, "दंगों में मेरे परिवार के 11 पुरूष सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। मेरा पालन पोषण मेरी मां ने तिलक विहार की विधवा कॉलोनी में किया। मुझे याद है कि बचपन में मेरी मां मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देती थी क्योंकि उन्हें यह भय रहता था कि कहीं बाहर निकलकर मैं उनसे वे खिलौने न मांग बैठूं जिन्हें वह खरीद न सके।"

बेअंत सिह भी दंगों के प्रभावित हुए थे। वह आज 24 वर्ष के हैं और वह तिलक विहार में ही एक कपड़े की दुकान पर सहायक का काम करते हैं। वह कहते हैं कि आज भी उन्हें दंगों की मार प्रभावित करती है।

सिंह ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "84' दंगे के एक साल बाद मेरा जन्म हुआ था। मेरे परिजनों को मजबूरन तिलक विहार विस्थापित होना पड़ा। यहां कोई ढंग का स्कूल नहीं था। परिवारिक मजबूरियों के चलते मुझे दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। फिलहाल, ओपन स्कूल से आगे की पढ़ाई कर रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी।"

बाबू सिंह दुखिया की भी कहानी कुछ इसी तरह है। वह तिलक विहार में दंगा प्रभावितों के लिए कल्याण संस्थान चलाते हैं। वह खुद पांच बच्चों के साथ एक कमरे के मकान में रहते हैं।

दुखिया कहते हैं, "इस इलाके के 20 से 25 साल के अधिकांश युवक साक्षर तक नहीं है।"

वह कहते हैं, "1985 में जब पूरे परिवार के साथ विस्थापित होकर यहां आया था, तो उस समय यहां पंजाबी माध्यम का एकमात्र स्कूल था वह भी पांचवी कक्षा तक। चूंकि यहां के बच्चे न तो हिन्दी बोल पाते थे और न ही अंग्रेजी, इसलिए उन्हें अन्य स्कूलों में दाखिला नहीं मिल पाता था। इसलिए अधिकांश बच्चों ने पांचवी के बाद पढ़ाई छोड़ दी।"

दुखिया बताते हैं, "दंगों ने कई बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर दी। हमारे कोई भी बच्चे अच्छी शिक्षा नहीं पा सके। इसीलिए आज वे मजदूरी करते है या फिर रिक्शा चला रहे हैं।"

त्रिलोकपुरी में रहने वाले बेअंत सिंह कहते हैं, "जब दंगे हुए थे तो मैं मां के गर्भ में था। मैं ऐसे परिवार में जन्मा जहां न तो पिताजी, न दादाजी और न ही कोई चाचा थे। मां को संघर्ष करता देखकर मैं मजबूरन नशे का आदी हो गया।"

वह कहते हैं, "एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के सहयोग से नशे की लत छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। महज तीन वर्षो में 70 युवाओं को इस नशा मुक्ति केंद्र में लाया जा चुका है। सरकार से कई आश्वासन मिले लेकिन दंगा पीड़ितों के परिवार के किसी भी सदस्य को सरकारी नौकरी नहीं दी गई।"

उस दौर में जन्मे कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया और खुद को और अपने परिवार को मजबूती दी।

सिमरन कौर एक कॉल सेंटर में काम करती हैं। वह गर्व से कहती हैं कि विधवा कॉलोनी में रहने वाली वह एकमात्र लड़की है जिसने अपनी पढ़ाई पूरी की।

वह कहती है, "मुझे अहसास हुआ कि बीते दिनों की बातें सोचकर अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करनी चाहिए। मुझे पता था कि पढ़ाई से मुझे नई जिंदगी मिल सकती है। मैंने परिस्थितियों का मुकाबला किया और अपनी पढ़ाई पूरी की। मुझे खुशी है कि मैं आत्मनिर्भर हूं और अपने कॉलोनी की सबसे अधिक पढ़ी लिखी लड़की।"

राहुल सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र हैं। वह कहते हैं, "मैं जब देखता हूं कि दंगों के 25 साल बाद भी लोगों को न्याय नहीं मिला तो मुझे बेहद दुख होता है। मुझे आश्चर्य होता है जब मेरे दोस्त कहते हैं कि उन्हें 84 के दंगों के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।"

वह कहते हैं, "लोगों को आगे बढ़ते रहना पड़ता है। मैं भी वही कर रहा हूं।"

उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर की उनके दो सुरक्षाकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद लगातार चार दिनों तक बदले की आग में सिखों को मौत के घाट उतारा गया। 84' के इन सिख विरोधी दंगों में लगभग 3,000 सिख मारे गए थे।

दंगों के बाद पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में अधिकांश पीड़ितों का पुनर्वास किया गया था। ऐसे परिवारों में जन्मे बच्चे आज भी दंगों की मार से झेल हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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