कलयुग में भी 'कल्पवास' में पर्णकुटीर बनाकर रहते हैं लोग
भौतिकवादी संसारिकता से बिल्कुल अलग, ऊंच-नीच के भेदभाव से दूर और अमीरी-गरीबी के अंतर से विलग इस 'कल्पवास' मेले में प्रतिवर्ष 2000 से 3000 लोग शामिल होते हैं। सरकार ने इसे राजकीय मेला घोषित किया है। ऐसी मान्यता है कि राजा विदेह (जनक) के शासन काल में यह उनके राज्य का दक्षिण द्वार हुआ करता था, जहां राजा जनक और विश्वामित्र ने भी कल्पवास किया था।
कहा जाता है कि राजा जनक ने अयोध्या जाते वक्त गंगा के इसी तट पर ऋषि-मुनियों के पांव भी पखारे थे। इस कल्पवास में मिथिलांचल के अलावा पड़ोसी नेपाल सहित सहित दूर-दराज के बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं हिस्सा लेते हैं, इनमें महिलाओं की संख्या अधिक होती है।
यहां झोपड़ियों में रहने वालों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से प्रारंभ होती है और देर रात तक प्रवचन और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यो के साथ समाप्त होती है।
बेगूसराय जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर सिमरिया में गंगा तट पर लगने वाले इस मेले का आरंभ कार्तिक माह के शुरू होने से एक सप्ताह पहले होता है और कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन यह समाप्त हो जाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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