सार्वजनिक शौचालयों की खराब स्थिति पर अदालत ने एमसीडी को लताड़ा

न्यायाधीश संजय किशन कौल और न्यायाधीश अजित भरिहोक की खंडपीठ ने बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति सुधारने में असफल रहने के लिए एमसीडी को जमकर लताड़ा।

पीठ ने कहा," हम राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन करने जा रहे है और हमारा सफाई तंत्र अभी भी तैयार नहीं है। आप दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं।"

एमसीडी की ओर से इस सप्ताह की शुरूआत में अदालत को बताया था कि राजधानी में सफाई व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

इस मामले में वकील अशोक अग्रवाल ने पीठ को बताया, "हम राजधानी को राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के लिए तैयार कर रहे हैं और यह डरावना तथ्य है कि शहर की नागरिक एजेंसियां अपना प्राथमिक काम भी नहीं कर रहीं हैं। यह नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है, खासकर महिलाओं के जिन्हे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। "

इस पर पीठ ने कहा,"कोई सुधार नहीं हुआ है। पिछले पांच साल में एमसीडी ने सामुदायिक शौचालयों के लिए कोई काम नहीं किया है। यह हमारे लिए शर्मनाक है कि महिलाओं को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है।"

अदालत ने केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड(सीपीसीबी) से कहा है कि वह छह सप्ताह के अंदर एक रिपोर्ट पेश कर बताए कि एमसीडी ने राजधानी में साफ-सफाई की व्यवस्था में सुधार के लिए क्या कदम उठाए हैं।

लेडी श्रीराम कालेज(एलएसआर) में अर्थशास्त्र की छात्रा शहाना शेख ने सार्वजनिक शौचालयों की खराब स्थिति का मामला उठाया है। शहाना ने मई 2008 से जुलाई के बीच दिल्ली के बाहरी इलाकों की झोपड़पट्टियों वाले इलाकों का दौरा किया था।

शेख के अनुसार, एमसीडी ने अपनी 2007 की रिपोर्ट में दावा किया है कि राष्ट्रीय राजधानी में कुल 3,192 सार्वजनिक सुलभ शौचालय हैं लेकिन उसे सर्वेक्षण के दौरान सिर्फ 1,534 शौचालय ही मिले।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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