मन्ना डे ने दादा साहेब फाल्के पुरस्कार ग्रहण किया

मन्ना डे का असली नाम प्रबोध चंद्र डे है। उनका जन्म पहली मई 1919 को पूर्ण चंद्र और महामाया डे के घर हुआ था। वर्ष 1950 से 1970 के दशक के बीच उनका नाम हिंदी सिनेमा के लिए पर्याय बन गया था। उन्होंने 3,500 से भी अधिक गीतों को अपनी आवाज दी है।

मन्ना डे ने अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत फिल्म तमन्ना (1943) से की थी।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के तहत फीचर फिल्म के खंड में 31 श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाते हैं, जिनमें श्रेष्ठ फीचर फिल्म, निर्देशक की श्रेष्ठ प्रथम फिल्म, मनोरंजन से भरपूर सबसे लोकप्रिय फिल्म, श्रेष्ठ निर्देशन, श्रेष्ठ अभिनेता, श्रेष्ठ अभिनेत्री, श्रेष्ठ सम्पादन, श्रेष्ठ संगीत, श्रेष्ठ कोरियोग्राफी आदि शामिल हैं।

गैर-फीचर फिल्म खंड में 22 श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाते हैं, जिनमें श्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म, श्रेष्ठ जीवन चरित्र, विशेष ज्यूरी पुरस्कार, श्रेष्ठ ध्वनि चित्रण आदि शामिल हैं।

सिनेमा पर श्रेष्ठ लेखन और श्रेष्ठ फिल्म समालोचन के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि 7 सितम्बर, 2009 को वर्ष 2007 के लिए 55वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की गई थी। कांचीवरम (तमिल) को श्रेष्ठ फीचर फिल्म घोषित किया गया था। कांचीवरम के अभिनेता प्रकाश राज को इस फिल्म में एक संवेदनशील बहु-आयामी बुनकर की भूमिका निभाने के लिए श्रेष्ठ अभिनेता घोषित किया गया है।

भरपूर मनोरंजन के लिए 'चक दे इंडिया' (हिन्दी) को श्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का पुरस्कार प्रदान किया गया। परिवार कल्याण के मुद्दे पर बनी 'तारे जमीं पर' (हिन्दी) को श्रेष्ठ फिल्म में शामिल किया गया। 'तारे जमीं पर' को श्रेष्ठ पुरुष पाश्र्वगायक और श्रेष्ठ गीत के लिए भी पुरस्कार मिले हैं।

कन्नड़ फिल्म 'गुलाबी टॉकीज' में भूमिका के लिए उमाश्री को श्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में सम्मानित किया गया। मराठी फीचर फिल्म 'टिज्ञा' में भूमिका निभाने के लिए मास्टर शरद गोयकर को श्रेष्ठ बाल कलाकार का पुरस्कार दिया गया।

मलयालम फीचर फिल्म 'नालू पेनुंगल' के निर्देशन के लिए अडूर गोपालकृष्णन ने श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार हासिल किया। इस फिल्म ने बी़ अजित कुमार के लिए श्रेष्ठ सम्पादन पुरस्कार भी जीता है।

चिल्ड्रेंस फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया ने हिन्दी फिल्म 'फोटो' का निर्माण किया था जिसे श्रेष्ठ बाल फिल्म का पुरस्कार प्रदान किया गया। फीचर फिल्म पुरस्कारों के लिए सई परांजपे ज्यूरी प्रमुख थीं। फीचर फिल्म श्रेणी के लिए 92 प्रविष्टियों के बारे में 55वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए निर्णय करने हेतु ज्यूरी के अन्य 13 सदस्य भी शामिल थे।

'होप डायज लास्ट इन वार' को श्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म का पुरस्कार दिया गया। अपनी मलयालम गैर-फीचर फिल्म 'वेल्लापोकथिल' के लिए श्री जयराज को श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार प्रदान किया गया। सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान, कोलकाता ने निदेशक श्वेता मर्चेन्ट द्वारा बंगला फिल्म 'लाल जूटो' का निर्माण कराया था, जिसे किसी निर्देशक की श्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म के रूप में पुरस्कृत किया गया।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का लक्ष्य सुरुचिपूर्ण और तकनीकी तौर पर उत्कृष्ट तथा सामाजिक तौर पर प्रासंगिक फिल्मों के निर्माण को बढ़ावा देकर सिनेमा के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृतियों के प्रति समझ और सम्मान के प्रति योगदान करना और इस प्रकार राष्ट्र की एकता और अखंडता को बढ़ावा देना है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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