सैन्य अदालत में फिर से सुनवाई चाहते हैं मुजीब के हत्यारे

बजलुल हुदा और ए.के.एम. मोहिउद्दीन के एक वकील ने सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ के समक्ष कहा कि तत्कालीन राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की उनके अधिकांश पारिवारिक सदस्यों व कुछ राजनीतिक सहयोगियों के साथ 16 अगस्त 1975 को की गई हत्या कोई साजिश नहीं, बल्कि सैन्य विद्रोह का परिणाम था।

कई वर्षो के अंतराल के बाद सर्वोच्च न्यायालय की एक विशेष पीठ ने इस महीने पांच सैन्य अधिकारियों की मृत्यदंड की सजा के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है।

अधिवक्ता अब्दुल्लाह-अल-मामुन ने अदालत को बताया कि पूरी सेना इस हत्याकांड के पीछे थी, जो कि एक तख्तापलट का परिणाम था।

अधिवक्ता ने कहा कि उनके मुवक्किलों ने बांग्लादेश को एक राजतंत्र के रूप में घोषित करने से मुजीब को रोका था।

मुजीब और उनकी सरकार को भारत समर्थक माना जाता था, क्योंकि भारत ने वर्ष 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में मदद की थी।

मामुन ने कहा कि तत्कालीन सेना प्रमुख ने मुजीब की ओर से आए एसओएस का कोई जवाब नहीं दिया था। मुजीब ने उन्हें उस समय फोन किया था, जब हमलावर उनके घर में घुस गए थे।

वायु सेना और नौसेना तथा अन्य शीर्ष नागरिक और सैन्य अधिकारियों ने भी मुजीब को बचाने की कोशिश नहीं की थी।

समाचार पत्र डेली स्टार ने कहा है कि अपनी बहस को समेटते हुए मामुन ने कहा कि हमलावरों की मंशा मुजीब या उनके परिवार को मारने की नहीं थी।

मामुन ने कहा कि यदि मामले की सुनवाई सैन्य कानून के तहत की जाए तो असली दोषी बेनकाब हो जाएंगे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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