पश्चिमाभिमुख देव के सूर्य मंदिर में जुटते हैं लाखों श्रद्धालु
पटना, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। बिहार के औरंगाबाद जिले में देव स्थित सूर्य मंदिर एक ऐसा मंदिर है जो पूर्वाभिमुख ना होकर पश्चिमाभिमुख है। छठ के अवसर पर इस मंदिर में लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है और लोग भगवान भास्कर को अघ्र्य अर्पित करते हैं।
ऐतिहासिक देव सूर्य मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला और धार्मिक महत्ता के कारण ही लोगों की मान्यता है कि इसका निर्माण खुद भगवान विश्वकर्मा ने किया है। हालांकि इसके निर्माण को लेकर इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं।
मंदिर के निर्माणकाल के संबंध में उसके बाहर संस्कृत में लिखे श्लोक के मुताबिक 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद राजा इलापुत्र पुरूरवा ऐल ने इस सूर्य मंदिर का निर्माण प्रारंभ करवाया था। शिलालेख से पता चलता है कि पूर्व 2007 में इस पौराणिक मंदिर के निर्माणकाल का एक लाख पचास हजार सात वर्ष पूरा हुआ।
हालांकि एक वर्ष पुरातत्व विभाग के अधिकारी धर्मवीर शर्मा के नेतृत्व में आए दल का कहना था कि इस मंदिर का निर्माण आठवीं-नौवीं सदी के बीच कराया गया। यद्यपि, उन्होंने यह भी कहा कि यह प्राचीन मंदिर है और इसके विषय में और शोध की आवश्यकता है।
देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल, मध्याचल तथा अस्ताचल के रूप में विद्यमान हैं। देव सूर्य मंदिर न्यास समिति के रवीन्द्र कुमार रवि बताते हैं कि देश में देव का मंदिर ही एक मात्र ऐसा सूर्य मंदिर है जिसका मुख पूर्व न होकर पश्चिम की तरफ है। करीब 100 फुट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। बिना सीमेंट अथवा चूना और गारे का प्रयोग किए पत्थरों को विभिन्न आकारों में काटकर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक और अद्भुत लगता है।
देव मंदिर के मुख्य पुजारी सच्चिदानंद पाठक की मानें तो ऐल एक राजा हुआ करते थे जो किसी ऋषि के श्रापवश श्वेत कुष्ठ से पीड़ित थे। वह एक बार शिकार करने देव के वन में आए और राह भटक गए। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई दिया जिसके किनारे वह पानी पीने गए और अंजुरी में पानी भर कर पीया जिससे उनका श्वेत कुष्ठ ठीक हो गया।
उन्होंने बताया कि वही सरोवर आज सूर्यकुंड के रूप में जाना जाता है। वह बताते हैं कि यहां चैत्र और कार्तिक माह में छठ करने आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच जाती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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