विद्वानों की नगरी चित्रकूट में 'गधा मेला'
उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी और राम की तपोभूमि चित्रकूट में विद्वानों की भरमार है। यहां हर वर्ष राष्ट्रीय रामायण मेला के अलावा 24 घंटे चार वेद 18 पुराणों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों के कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
देश के विभिन्न कोने से दीपावली के पर्व पर लाखों की तदाद में श्रद्धालु दीपदान करने आते हैं। बावजूद इसके दीपावली मेले के बाद नरक चौदस के दिन से पांच दिवसीय अन्तर्राज्यीय 'गधा मेला' भी कई वर्षो से आयोजित होता चला आ रहा है।
इस मेले में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के अलावा नेपाल तक से व्यापारी गधों को बेचने व खरीदने आते हैं। चांदनी, आरजू, रौनक, लखीचन्द, पारूल, नगीना और ऐसे ही कई नाम, जिन्हें बिकने के लिये उनके पालक तैयार कर रहे हैं।
नगर पंचायत चित्रकूट के मुख्य कार्यपालक अधिकारी बलवीर सिंह बताते हैं, "मेला में आने वाले गधों का पहले रजिस्ट्रेशन किया जाता है। गधों की बिक्री व खरीद पर नगर पंचायत को टैक्स के रूप में प्रति वर्ष लाखों रुपये की आय होती है। मेला क्षेत्र में बिजली, पानी, चारा व सफाई की व्यवस्था पंचायत कराती है।
पिछले साल के मेले में 'हीरा' नामक गधा सवा लाख रुपये में बिका था। महोबा के राजा देशराज और बच्छराज के जमाने में लोग घोड़ा, खच्चर व गधों की खरीदारी करने अफगानिस्तान के शहर काबुल जाया करते थे। वीर आल्हा के भाई ऊदल ने खुद काबुल जा कर एक घोड़ी की खरीद की थी। अब काबुल या अन्य जगह जाने की जरूरत नहीं है, इन पांच दिनों में विभिन्न प्रकार के घोड़े, खच्चर व गधे धर्म नगरी चित्रकूट में खरीदे जा सकते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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